2027 UP चुनाव: वाराणसी से यूपी फतह का प्लान, निशांत कुमार के कंधों पर JDU की कमान
जेडीयू ने 2027 UP विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार के नेतृत्व में उतरने का ऐलान किया है। वाराणसी में कार्यकर्ता सम्मेलन में पार्टी ने 60 पूर्वांचली सीटों पर फोकस किया। फायदा: NDA में रहने से कुर्मी-OBC वोट एकजुट होगा, सपा के PDA को टक्कर मिलेगी। नुकसान: अगर बीजेपी से सीट शेयरिंग नहीं हुई और जेडीयू अकेले लड़ी तो वोट बंटेगा, 2022 में जीती सीटों पर बीजेपी को नुकसान हो सकता है।

लखनऊ/वाराणसी। बिहार में एनडीए की जीत के बाद अब जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) ने उत्तर प्रदेश के 2027 विधानसभा चुनाव में एंट्री का ऐलान कर दिया है। इस बार जेडीयू की कमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे और बिहार सरकार में स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार के हाथों में होगी। वाराणसी के रोहनिया में हुए राज्य स्तरीय कार्यकर्ता सम्मेलन में जेडीयू के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय झा और निशांत कुमार ने साफ कहा कि पार्टी यूपी में एनडीए के घटक दल के रूप में चुनाव लड़ेगी। निशांत कुमार ने कहा, "जब हम दिल्ली और बिहार में पार्टनर हैं तो यूपी में क्यों नहीं?
हम 2002 और 2007 में यूपी में थे, 2027 में भी एनडीए के साथ लड़ेंगे।" उन्होंने कहा कि वो लगातार यूपी आएंगे और नीतीश मॉडल पर चुनाव लड़ेंगे। शिक्षा, रोजगार और शराबबंदी के बिहार मॉडल को यूपी में भी लागू करने का वादा किया। जेडीयू का फोकस पूर्वांचल की 60 सीटों पर है। वाराणसी, मिर्जापुर, जौनपुर, गाजीपुर, देवरिया, सोनभद्र, प्रयागराज, बलिया जैसे जिलों में कुर्मी, कोइरी, पटेल और अति पिछड़ा वर्ग का अच्छा वोट बैंक है। यही वोट बैंक बिहार में नीतीश कुमार का कोर वोटर रहा है। पार्टी मानती है कि नीतीश की कुर्मी नेता की छवि का फायदा यूपी में मिलेगा। सूत्रों के मुताबिक जेडीयू बीजेपी से 8-10 सीटें मांग रही है। अगर सीट शेयरिंग पर बात बनी तो NDA के अंदर चुनाव लड़ेगी, नहीं तो अकेले भी ताल ठोकने को तैयार है।
यूपी में जेडीयू का इतिहास निराशाजनक रहा है। 2002 में समता पार्टी के नाम पर 2 विधायक जीते थे, उसके बाद से खाता नहीं खुला। 2017 और 2022 में पार्टी ने अकेले चुनाव लड़ा। 2022 में 26-27 सीटों पर उम्मीदवार उतारे लेकिन एक भी सीट नहीं जीती, वोट शेयर 0.11% पर सिमट गया और ज्यादातर प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई। सियासी जानकारों के मुताबिक इसके दो पहलू हैं।
नफा: अगर जेडीयू NDA में रहती है तो बीजेपी को फायदा है। पूर्वांचल में कुर्मी-पटेल वोट अपना दल (S) के साथ मिलकर और मजबूत होगा। OBC वोट का बिखराव रुकेगा। निशांत के रूप में एक युवा कुर्मी चेहरे से बीजेपी को सपा के PDA और कांग्रेस के OBC कार्ड को काटने में मदद मिलेगी। साथ ही बिहार में गठबंधन धर्म निभाने का संदेश जाएगा।
नुकसान: अगर सीटों पर बात नहीं बनी और जेडीयू अकेले 60 सीटों पर लड़ी तो सीधा नुकसान बीजेपी का होगा। 2022 में इन सीटों पर बीजेपी ने क्लीन स्वीप किया था। जेडीयू के अलग लड़ने से कुर्मी-अति पिछड़ा वोट बंटेगा, जिसका फायदा सपा-कांग्रेस गठबंधन को मिलेगा। दूसरा, बीजेपी के पास यूपी में पहले से ही अपना दल, निषाद पार्टी और सुभासपा जैसे सहयोगी हैं। एक और हिस्सेदार आने से सीट बंटवारे का सिरदर्द बढ़ेगा। फिलहाल निशांत की ये लॉन्चिंग एक तरह से सौदेबाजी की राजनीति भी है। यूपी में ताल ठोककर जेडीयू बिहार और केंद्र में अपनी बार्गेनिंग पावर बढ़ाना चाहती है।




