ट्रेन नहीं, एंबुलेंस बनी वंदे भारत: सूटकेस में बंद दिल पहुंचाकर बचाई जान, तीसरी बार रचा इतिहास
सूरत से अहमदाबाद तक वंदे भारत ट्रेन से 'धड़कता दिल' पहुंचाया गया। सूरत के न्यू सिविल हॉस्पिटल से डोनर का दिल स्पेशल सूटकेस में रखकर मुंबई-गांधीनगर वंदे भारत (20901) के कोच C-12 में भेजा गया। यह तीसरी बार है जब वंदे भारत से दिल ट्रांसपोर्ट हुआ। अहमदाबाद स्टेशन पर ग्रीन कॉरिडोर बनाकर दिल को तुरंत यू.एन. मेहता इंस्टीट्यूट पहुंचाया गया, जहां ट्रांसप्लांट हुआ। समय बचाने के लिए रेलवे, पुलिस और डॉक्टरों ने मिलकर व्यवस्था की थी।

देश में अंगदान और ग्रीन कॉरिडोर की एक और मिसाल देखने को मिली है, जहां तकनीक और इंसानियत ने मिलकर एक जिंदगी बचा ली। गुजरात में वंदे भारत एक्सप्रेस के जरिए एक धड़कते हुए दिल को सूरत से अहमदाबाद पहुंचाया गया। ये कोई फिल्मी सीन नहीं, बल्कि हकीकत है। सूरत के न्यू सिविल हॉस्पिटल से एक ब्रेन-डेड डोनर का दिल निकालकर एक स्पेशल सूटकेस में रखा गया, जिसमें दिल को जिंदा रखने की पूरी व्यवस्था थी। इसके बाद उसे मुंबई सेंट्रल-गांधीनगर कैपिटल वंदे भारत एक्सप्रेस (ट्रेन नंबर 20901) के कोच C-12 में लोड किया गया।
अहमदाबाद डिवीजन के DRM वेद प्रकाश के मुताबिक, यह तीसरा मौका है जब वंदे भारत एक्सप्रेस का इस्तेमाल लाइव हार्ट ट्रांसपोर्ट के लिए किया गया है। इससे पहले भी दो बार सूरत से और एक बार अंकलेश्वर से दिल को इसी तरह अहमदाबाद पहुंचाया गया था। रविवार 1 नवंबर को जब ट्रेन सूरत से निकली तो पूरा रेलवे सिस्टम अलर्ट पर था। वेस्टर्न रेलवे, RPF, GRP, गुजरात पुलिस और अस्पताल की टीमों ने मिलकर एक फुल-प्रूफ प्लान बनाया था। जैसे ही ट्रेन अहमदाबाद स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 1 पर पहुंची, वहां पहले से ही ग्रीन कॉरिडोर बना हुआ था। मतलब, प्लेटफॉर्म से लेकर अस्पताल तक के पूरे रास्ते पर ट्रैफिक रोक दिया गया था ताकि दिल को बिना एक सेकंड गंवाए यू.एन. मेहता इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियोलॉजी एंड रिसर्च सेंटर पहुंचाया जा सके।
डॉक्टरों के मुताबिक दिल को शरीर से निकालने के बाद 4 से 6 घंटे के अंदर ट्रांसप्लांट करना होता है, नहीं तो वह खराब हो जाता है। ऐसे में वंदे भारत की स्पीड और टाइम पर चलने की वजह से यह काम संभव हो पाया। सूरत से अहमदाबाद का सफर इस ट्रेन ने करीब 3 घंटे 37 मिनट में पूरा किया। सड़क से यह सफर ज्यादा समय लेता और जाम का रिस्क भी रहता, जबकि फ्लाइट महंगी और हर जगह उपलब्ध नहीं होती। इसलिए ट्रेन एक सस्ता और भरोसेमंद विकल्प बनकर उभरी है। यू.एन. मेहता अस्पताल की स्पेशलिस्ट टीम ने इस दिल को एक जरूरतमंद मरीज में सफलतापूर्वक ट्रांसप्लांट कर दिया है।
इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि अगर व्यवस्था चाहे तो सूटकेस में धड़कता दिल भी सैकड़ों किलोमीटर दूर दूसरे शरीर में नई धड़कन बन सकता है। रेलवे का यह कदम ऑर्गन डोनेशन को बढ़ावा देने में बड़ा रोल निभा रहा है।
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