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गुरुवार, 5 नवंबर 2026 · शाम 5:10 · नई दिल्ली संस्करण

सरकार की वो योजना जो कोई एयरलाइन नहीं लेना चाहती थी, अब उसी की हो रही मांग

हवाई सफर फिर महंगा हो गया है। दिल्ली में ATF की कीमत एक महीने में 13% बढ़कर 137 रुपये प्रति लीटर पहुंच गई। पहले फ्यूल एयरलाइंस के खर्च का 30-40% था, अब यह 55-60% हो गया है। इंडिगो, एयर इंडिया और अकासा ने फ्यूल सरचार्ज बढ़ा दिया है। घरेलू टिकट पर 400 से 1,300 रुपये तक ज्यादा देना पड़ रहा है। एयरलाइंस ने सरकार से 10,000 करोड़ के ATF प्राइस स्टेबिलाइजेशन फंड को फिर शुरू करने की मांग की है। यह योजना जुलाई में लैप्स हो गई थी।

राष्ट्रीय सागर डेस्क3 मिनट का पठन
सरकार की वो योजना जो कोई एयरलाइन नहीं लेना चाहती थी, अब उसी की हो रही मांग

हवाई सफर एक बार फिर महंगा हो गया है। वजह है एविएशन टर्बाइन फ्यूल यानी ATF की कीमतों में तेज उछाल। पिछले कुछ महीनों में जेट फ्यूल की कीमतों ने एयरलाइंस की कमर तोड़ दी है और इसका सीधा बोझ अब यात्रियों की जेब पर पड़ रहा है। दिल्ली में ATF की कीमत एक ही महीने में करीब 13-14% बढ़कर 137 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई। इंडिगो के मुताबिक यह पिछले एक दशक के सबसे ऊंचे स्तरों में से एक है। मई 2026 में भी अंतरराष्ट्रीय कीमत 142 रुपये प्रति लीटर तक जा चुकी थी, जबकि मार्च में यह सिर्फ 60.50 रुपये प्रति लीटर थी। यानी कुछ ही महीनों में कीमत ढाई गुना से ज्यादा बढ़ गई।



पहले एयरलाइंस के कुल खर्च में फ्यूल की हिस्सेदारी 30-40% हुआ करती थी। अब फेडरेशन ऑफ इंडियन एयरलाइंस (FIA) के मुताबिक यह बढ़कर 55-60% तक पहुंच गई है। FIA में एयर इंडिया, इंडिगो और स्पाइसजेट जैसी बड़ी कंपनियां शामिल हैं। खर्च बढ़ा तो एयरलाइंस ने फ्यूल सरचार्ज बढ़ा दिया। इंडिगो ने घरेलू रूट पर 375 रुपये से 1,300 रुपये और इंटरनेशनल रूट पर 1,000 रुपये से 10,000 रुपये तक सरचार्ज लगा दिया। एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस ने घरेलू उड़ानों पर एक तरफ का 400 से 1,200 रुपये तक सरचार्ज वसूला। अकासा एयर ने भी घरेलू सरचार्ज शुरू कर दिया। त्योहारी सीजन में इसका असर सबसे ज्यादा दिखा। जिन लोगों ने पहले से टिकट नहीं बुक किया था, उन्हें ज्यादा किराया देना पड़ा।



भारत में ATF की कीमत देश में बनी लागत पर नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क पर तय होती है। यानी भले ही फ्यूल भारत की रिफाइनरी में बना हो, दाम ग्लोबल बाजार और डॉलर के हिसाब से तय होता है। इस पर केंद्र का एक्साइज ड्यूटी और राज्यों का VAT भी लगता है। हर राज्य में VAT अलग होने से हर एयरपोर्ट पर कीमत अलग हो जाती है। ऊपर से पश्चिम एशिया में जारी तनाव, हवाई क्षेत्र की पाबंदियां, लंबा रूट और रुपये में गिरावट ने दबाव और बढ़ा दिया है। जून में केंद्र सरकार ने 10,000 करोड़ रुपये के ATF प्राइस स्टेबिलाइजेशन फंड (PSF) को मंजूरी दी थी। इसके तहत ATF की कीमत 115 रुपये प्रति लीटर के बेंचमार्क पर 36 महीने तक स्थिर रखने का प्रस्ताव था। 



ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को ब्याज मुक्त एडवांस दिया जाना था, ताकि कीमत बढ़ने पर भी एयरलाइंस को राहत मिले। लेकिन यह योजना फेल हो गई। 60 दिन के अंदर किसी भी एयरलाइन ने ऑयल कंपनियों के साथ MoU साइन नहीं किया। उस समय कीमत बेंचमार्क से नीचे थी, इसलिए एयरलाइंस को इसमें फायदा नहीं दिखा। जुलाई में यह योजना लैप्स हो गई। अब जब कीमतें फिर उछल गई हैं, तो एयरलाइंस उसी पुरानी योजना की वापसी चाहती हैं। FIA ने सरकार को पत्र लिखकर मांग की है कि ATF की कीमत असली रिफाइनिंग लागत यानी कॉस्ट-प्लस के आधार पर तय हो, एक्साइज ड्यूटी फिक्स्ड रेट पर हो और टैक्स व एयरपोर्ट चार्ज में राहत जारी रहे। साथ ही ECLGS 5.0 के तहत रुका हुआ कर्ज भी जल्द जारी किया जाए।



नागरिक उड्डयन मंत्री के. राममोहन नायडू ने कहा है कि सरकार PSF को फिर से शुरू करने पर विचार कर रही है। इस बार एयरलाइंस और ऑयल कंपनियों के सुझावों से शर्तें बदली जा सकती हैं। अगर योजना वापस आती है और शर्तें व्यावहारिक होती हैं, तो एयरलाइंस को स्थिरता मिलेगी और यात्रियों को किरायों में राहत मिल सकती है। नहीं तो हवाई सफर आम आदमी के लिए और महंगा होता जाएगा। 

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