संघर्ष में पत्नी ने दिया साथ, तो अरुण ने 14 हजार लोगों तक पहुंचा दिया ''वीरा की शपथ''
संघर्ष में पत्नी ने दिया साथ, तो अरुण ने 14 हजार लोगों तक पहुंचा दिया ''वीरा की शपथ''
पटना/बेगूसराय, 24 फरवरी । कहा जाता है कि हर सफल पुरुष के पीछे किसी ना किसी नारी का हाथ होता है और यह सिर्फ कहावत नहीं, आज भी चरितार्थ हो रहा है। ऐसी ही कहानी है पटना निवासी अरुण कुमार की। फिल्म नगरी में पैर जमाने गया युवक जब आठ साल के संघर्ष में असफल हो गया तो अपनी प्रतिभा के दम पर उसने यूपीएससी की तैयारी शुरू की।
इसी दौरान विश्व में ज्ञान की भूमि कहे जाने वाली बिहार के लाल की कलम अचानक जाग उठी और साथ मिला पत्नी दीपिका का तो उसने ''वीरा की शपथ'' लिख डाल। किसी प्रकाशक ने उस पर जब संज्ञान नहीं लिया तो पत्नी दीपका संघर्ष के सफर में साथ देने के लिए तैयार हो गई और विगत एक वर्ष से देश के विभिन्न शहरों में घूमकर लोगों की सपोर्ट मांग रहा है। पति-पत्नी नया लेखक हूं सपोर्ट चाहिए का पोस्टर लेकर चौराहे पर खड़े होते हैं तो सुबह आठ बजे से रात आठ बजे तक दीपिका खड़ी ही रहती है।
इस दौरान पैर में दर्द हुआ, सूजन आ गया, छाले पड़ गए। लेकिन उसने अपने पति के संघर्ष के सफर को विराम नहीं लगने दिया है और एक साल में यह पुस्तक 14 हजार से लोगों अधिक लोगों ने खरीदी। अभी भी उन्हें जबरदस्त समर्थन मिल रहा है। विगत तीन दिनों से अरुण और दीपिका बेगूसराय के चौक-चौराहों खड़ा होकर लोगों से सपोर्ट मांग रहे हैं तो बड़ी संख्या में युवा उनके समर्थन में आ गए हैं। वीरा की शपथ की बिक्री उनकी सोच से अधिक होने लगी है।
175 पृष्ठ के इस किताब की शुरुआत वीरा की नियति से शुरू होकर, खून की बाँसुरी, मृत की आवाज, अतीत की रौशनी, बागन- एक छुपी हुई जगह, लटकती आत्माएं, डर या भाग्य, एक काली रौशनी, अदृश्य जुडवां भाई, प्रेम का दलदल, प्रेम का बीज, विशालकाय बिच्छू, एक गद्दार जासूस, महावीर : एक रक्षक, गलत ही सही रास्ता है, लाल कपड़ा, एक आखिरी विकल्प और खूनी दीवार से होते हुए वीरा की शपथ के साथ समाप्त होता है। पति-पत्नी के प्रयास से सड़क पर दस हजार पुस्तक बेचने का इतिहास रचने के बाद छपाए गए अगले दस हजार में हिंदुस्तान की सड़कों पर बनता इतिहास नाम से भी एक अध्याय जोड़ दिया गया है।
अपने सफर के संबंध में अरुण बताते हैं कि जीवन जीने का व्यवहारिक रास्ता छोड़कर, मैंने साल 2011 में अपना सफर शुरू किया। अभिनेता बनने की चाह मुंबई ले गई, जहां बरसों दर दर ठोकरें खाने के बाद भी मेरी मेहनत की भूमि पर सफलता की एक बूंद तक नहीं गिरी। नाम बनाने से पहले शादी करने की इच्छा नहीं थी, लेकिन समय अपनी धुन में चलता है, उसके आगे कब किसकी चली है। संघर्ष के बीच में ही मैं संसार के सबसे पवित्र बंधन में बंध गया।
संघर्ष जारी रहा, हर दिन किसी चमत्कार की उम्मीद में मैंने सपनों का दामन कभी नहीं छोड़ा। लेकिन उम्मीद और हकीकत में फर्क होता है। आखिरकार समय जीत ही गया और मैं हार गया। हकीकत से कब तक भागता, मैंने भी हार मान ली और मुंबई से रोते हुए पटना वापिस आ गया। 20 साल की उम्र का मेधावी छात्र, 28 की उम्र में नाकामयाब हो चुका था। समय के शतरंज में मैं उस मोहरे की तरह फंस गया जिसके पास चलने को एक घर भी नहीं होता। इसी दौरान बचपन के मित्र ध्रुव शेखर ने सिविल सर्विसेज की तैयारी की सलाह दी।
तैयारी तो सिविल सर्विसेज की शुरू हुई, लेकिन यूपीएससी की तैयारी के लिए उठी कलम ने बागी रूप अख्तियार कर लिया। कलम ने यूपीएससी के रास्ते को छोड़ दिया और अपनी धुन में उल्टी दिशा में जाने लगी। कलम से कहानियां बहने लगी, गीत, गजल, शायरी बहने लगे, दोहे, कविताओं की बाढ़ आ गई। मैंने फिर से एकतरफा रास्ता लिया, आंखें बंद की और लगा दी छलांग स्याही के समंदर में। उसी छलांग का नतीजा है वीरा की शपथ।
लेखक, शायर, कवि, दोहाकार, गीतकार बनकर मैं हार को हरा चुका था और विजय यात्रा के एक पड़ाव को पार कर चुका था। अपनी किताब के प्रकाशन और वितरण के लिए मैंने कई दरवाजे खटखटाए। लेकिन धन की धुंध में अंधी हो चुकी दुनिया को शायद मैं, मेरी किताब और मेरा संघर्ष दिखा ही नहीं। इसी दौरान हम दोनों ने मिलकर फैसला लिया कि सड़कों पर उतरेंगे और सड़कों पर गुजर रही जनता से सपोर्ट मांगेंगे। एक पोस्टर बनाया नवोदित लेखक को समर्थन की आवश्यकता है (Debut author needs support) पोस्टर लेकर छह फरवरी को मैं दीपिका के साथ दिल्ली में कनॉट प्लेस में अपने इस अंतिम संघर्ष की शुरुआत की।
मेरा उद्देश्य लोगों को अपनी स्याही से रू-ब-रू कराना और युवाओं को संदेश देना है कि आप बिना साधन के भी लड़कर जीत सकते हैं। यात्रा को आगे बढ़ाते हुए हम महात्मा बुद्ध की नगरी गए, वहां जबर्दस्त रिस्पॉन्स मिला। यहां के बाद ज्ञान की धरती नालंदा का सफर तय किया। नवादा के बाद हमने झारखंड में पुस्तक को प्रमोट किया। वहां से फिर बेगूसराय आ गया हूं और यहां से समस्तीपुर होते हुए बिहार के अन्य शहरों की यात्रा होगी। लोग मुझे और मेरी पत्नी को देखकर मजाक उड़ाते हैं और खूब हंसते हैं। पांव जब सूज जाते हैं और भूख प्यास बुलाती है, तब भी मैं मैदान छोड़कर उधर नहीं जाता हूं। प्यार की मूरत पत्नी दीपिका ने सुख का उपवन त्यागकर, संघर्ष के घने जंगल का चुनाव किया और पूरे सफर में मेरे संग-संग लड़ रही है।





