13 करोड़ वोटर नाम हटाने का आरोप, फिर भी बचे CEC ज्ञानेश, SC ने कहा- उम्मीद है संस्थाएं...
सुप्रीम कोर्ट ने CEC ज्ञानेश कुमार के निलंबन की मांग खारिज कर दी। CJI सूर्यकांत की बेंच ने कहा- अंतरिम राहत नहीं दे सकते। याचिका में आरोप था कि SIR के 14 फैसले बिना दो अन्य आयुक्तों की सहमति के लिए। कोर्ट ने कहा- उम्मीद है संवैधानिक संस्थाएं आपसी विश्वास से काम करेंगी, मतभेद होना स्वाभाविक है।

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने की मांग वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने आज खारिज कर दिया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन जजों की बेंच ने अंतरिम राहत देने से साफ इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि वह इस तरह से एक संवैधानिक पदाधिकारी को काम करने से नहीं रोक सकता। सुनवाई के दौरान बेंच ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा, 'उम्मीद है संवैधानिक संस्थाएं आपसी विश्वास और सामूहिक जिम्मेदारी के साथ काम करेंगी।' कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग एक बहुसदस्यीय संस्था है और उसके भीतर मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर आरोप पर CEC को सस्पेंड कर दिया जाए।
यह पूरा मामला SIR यानी वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन को लेकर है। पटना निवासी राकेश कुमार सिंह और अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने दो अलग-अलग PIL दायर की थीं। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि CEC ज्ञानेश कुमार ने अपने दो सहयोगी चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की सहमति के बिना फैसले लिए हैं। याचिका में एक खोजी रिपोर्ट का हवाला दिया गया, जिसमें दावा किया गया था कि अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच 10 महीनों में दोनों चुनाव आयुक्तों ने SIR से जुड़े फैसलों पर कम से कम 14 बार आधिकारिक आपत्ति दर्ज कराई थी। याचिका में कहा गया कि फॉर्म-6 में बदलाव, ECINet और ERONet जैसे सॉफ्टवेयर में बदलाव और 30 राज्यों में करीब 13 करोड़ नाम वोटर लिस्ट से हटाने जैसे बड़े फैसले अकेले CEC के स्तर पर लिए गए।
अंतिम फैसला आने तक CEC ज्ञानेश कुमार को निलंबित किया जाए। SIR से जुड़े 14 फैसलों को रद्द किया जाए। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में SIT या न्यायिक आयोग से जांच हो। ECINet और ERONet का फॉरेंसिक ऑडिट हो। CEC के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज हो और चुनाव आयोग के मूल रिकॉर्ड, फाइल नोटिंग और मीटिंग के मिनट्स कोर्ट में पेश किए जाएं। याचिकाकर्ताओं के वकील विकास सिंह ने दलील दी कि चुनाव आयोग कानूनन बहुसदस्यीय संस्था है, उसके फैसले सर्वसम्मति या बहुमत से होने चाहिए। अगर आरोप सही हैं तो मामला लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है। वहीं चुनाव आयोग ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया।
आयोग ने कहा कि किसी भी संस्था में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय होना सामान्य है, लेकिन उसके सभी आदेश पूरी कानूनी वैधता के साथ और निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए जारी किए गए हैं। SIR और Form-6 से जुड़े फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। दोनों पक्षों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम निलंबन की मांग को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ मीडिया रिपोर्ट और कथित आपत्तियों के आधार पर CEC जैसे संवैधानिक पद को खाली नहीं किया जा सकता। हालांकि कोर्ट ने याचिकाओं को पूरी तरह खत्म नहीं किया है और चुनाव आयोग से कुछ फाइलों पर हलफनामा मांगा है। इस फैसले के बाद विपक्ष, जो ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और महाभियोग की मांग कर रहा था, को बड़ा झटका माना जा रहा है।





