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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · रात 3:55 · नई दिल्ली संस्करण

कोसी नदी बेसिन पर मंडराया जल संकट, जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चिंता

राष्ट्रीय सागर डेस्क2 मिनट का पठन
कोसी नदी बेसिन पर मंडराया जल संकट, जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चिंता

हरिद्वार। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की और जी.बी. पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान के संयुक्त अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि जलवायु परिवर्तन के कारण उत्तराखंड की कोसी नदी बेसिन की दीर्घकालिक जल सुरक्षा गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है। अध्ययन के अनुसार बढ़ता तापमान, भूजल पुनर्भरण में कमी और सूखे की बढ़ती घटनाएं कुमाऊँ क्षेत्र में कृषि, पेयजल आपूर्ति तथा हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बड़ी चुनौती बन सकती हैं।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की के डाॅ.बी.दास, डॉ.एस. एन.और जी.बी.पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान के डॉ. संदीपन मुखर्जी ने बताया कि अध्ययन से पता चला है कि इस शताब्दी के अंत तक अधिकतम तापमान वर्तमान लगभग 38.4 डिग्री सेल्सियस से बढ़कर मध्यम उत्सर्जन परिदृश्य में 41.6 डिग्री सेल्सियस तथा उच्च उत्सर्जन परिदृश्य में 43.2 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। तापमान में वृद्धि के कारण वाष्पोत्सर्जन बढ़ेगा और जल उपलब्धता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

शोध के अनुसार वर्ष 2100 तक कोसी नदी बेसिन की कुल जल उपलब्धता में 4 से 7 प्रतिशत की कमी, वाष्पोत्सर्जन में लगभग 13 प्रतिशत की वृद्धि तथा भूजल पुनर्भरण में 20 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आने की आशंका है। वहीं सतही अपवाह में करीब 20 प्रतिशत की वृद्धि से वर्षा का पानी तेजी से बह जाएगा और भूजल में जल के रिसाव में कमी आएगी।

अध्ययन में यह भी चेतावनी दी गई है कि भविष्य में सूखे की घटनाएं अधिक बार और लंबे समय तक बनी रह सकती है, जिससे प्राकृतिक जलस्रोतों, कुओं, कृषि उत्पादकता और स्थानीय समुदायों की पेयजल आवश्यकताओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

शोधकर्ताओं ने जल संकट से निपटने के लिए जलागम प्रबंधन, प्राकृतिक जलस्रोतों के पुनर्जीवन, मृदा एवं जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देने तथा प्रकृति-आधारित समाधानों को अपनाने पर जोर दिया है। उनका मानना है कि इन उपायों से कोसी नदी बेसिन की जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन क्षमता को मजबूत किया जा सकता है।

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