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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · रात 2:38 · नई दिल्ली संस्करण

हिमालय में कुदरत की 'इमरजेंसी', बर्फ देखने के लिए तरसे लोग

राष्ट्रीय सागर डेस्क3 मिनट का पठन
हिमालय में कुदरत की 'इमरजेंसी', बर्फ देखने के लिए तरसे लोग

उत्तरकाशी। पहाड़ों में इस बार कुदरत की इमरजेंसी से बर्फबारी के लोग तरस रहे है। दिसम्बर गुजर चुका है अब जनवरी का महीना बर्फबारी के बिना ही बीत रहा है। गंगोत्री -यमुनोत्री और बद्रीनाथ - केदारनाथ धाम जैसे प्रमुख तीर्थस्थलों के पहाड़ भी सूखे और बर्फहीन दिख रहे हैं। बर्फबारी और बारिश न होने से हिमालय में हाहाकार मच गया हैं।सर्दी बीतने वाली हैं, लेकिन हिमालय की चोटियां बिना बर्फ के खाली पड़ी हैं और वैज्ञानिकों ने इसे 'बर्फ का सूखा' कहा या हिमालय का एसओएस ( सिग्नल ऑफ सफरिंग) है। आंकड़ों के बात करे तो पिछले चार सालों में हिमालय रेंज में 23% की कमी आई है , उत्तराखंड में लगभग 90% और हिमाचल -लद्दाख में लगभग 86% बारिश की कमी रही है।वैज्ञानिकों ने इसे बताया हैं। यह पहाड़ों की धड़कते दिल की हलचल है जो अब लड़खड़ा रही है। हिमालय में जनवरी माह तक बर्फ और बारिश न एक गंभीर चिंता का विषय है, जहाँ जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान के कारण केदारनाथ, गंगोत्री और धौलाधार जैसी चोटियाँ बर्फ से वंचित हैं और पहाड़ सूखे व काले दिख रहे हैं; इससे न केवल पर्यावरण, वनस्पति और वन्यजीवों को खतरा है, बल्कि जल संकट और पर्यटन पर भी बुरा असर पड़ रहा है, जिससे पहाड़ों का पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ रहा है, यह भविष्य के लिए चेतावनी है।मौसम रोमांचक नहीं भयावक है और भविष्य रोशन नहीं धुंधला दिख रहा है। बता दें कि उत्तराखंड के चार धामों में नवंबर से दिसंबर तक जहां चार से 5 फीट बर्फ आम बात होती थी, आज वहां बर्फ का पहला फालाब जम रहे हैं, लेकिन बादल नहीं बरस रहे। ठंड दहशत दे रही है, लेकिन आसमान रहम नहीं दिखा रहा। क्या यह सिर्फ मौसम है या हिमालय का संतुलन बिगड़ चुका है? क्या यह सिर्फ प्रकृति की मर्जी है या हमने खुद अपने फैसलों से यह दिन बुलाया है।यदि इस जनवरी माह में भी सूखा रहा तो ग्लेशियर पिघलने से पहले ही कमजोर फरवरी अनिश्चित वसंत अनियंत्रित अप्रैल मई में नदी का जलस्तर गिरा हुआ जून जुलाई में बादल फटने के खतरे से उत्तराखंड के तीर्थाटन और टूरिज्म , बागवानी कृषि,ठप हो जायेगा जिससे यहां की अर्थव्यवस्था घायल हो जायेगी । वहीं एम.डी. इन स्नो स्पाइडर ट्रेक एंड टूर उत्तरकाशी के भागवत सेमवाल बताते हैं कि इस बार बर्फबारी न होने से टूरिज्म और साहसिक पर्यटन पर संकट गहरा गया है।यह स्थिति न केवल ग्लेशियरों के स्वास्थ्य के लिए खतरा है, बल्कि भविष्य के जल संकट की ओर भी इशारा कर रही है। यह सिर्फ मौसम की घटना नहीं, बल्कि एक गंभीर पर्यावरणीय संकेत है, जो भविष्य में बड़ी आपदाओं (जैसे बाढ़, भूस्खलन) की आहट हो सकती है, जैसा कि 2013 की आपदा से पता चला है। वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों ने सरकार और संबंधित मंत्रालयों से इस पर ठोस कार्रवाई करने की अपील की है।हिमालय से गायब हो गई बर्फउत्तराखंड की पहाड़ी चोटियां, लगभग सभी हिमालयी पहाड़ी चोटियां आमतौर पर पूरे साल बर्फ से ढकी रहती थीं, लेकिन बर्फ जल्दी गायब हो गई है। पिछले चार -पांच सालों से हिमालय रेंज में बर्फ समय से बेहद कम पड़ रही है जो धरती के तापमान में बढ़ोतरी के कारण ज्यादा समय तक नहीं टिकती। हाल ही में जमा किए गए डेटा से पता चलता है ।

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