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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · रात 2:34 · नई दिल्ली संस्करण

डाक कांवड़, गंगाजल लेकर नहीं रुकते कदम, कंधे पर कांवड़, हाथ में गंगाजल और आंखों में एक ही संकल्प

राष्ट्रीय सागर डेस्क3 मिनट का पठन

हरिद्वार। धर्मनगरी हरिद्वार में कांवड़ मेले का अंतिम चरण अपने चरम पर पहुंच गया है। हरकी पैड़ी समेत गंगा घाटों पर डाक कांवड़ियों का जनसैलाब उमड़ रहा है। सामान्य कांवड़ यात्रा से बिल्कुल अलग डाक कांवड़ में आस्था के साथ रफ्तार और समय की चुनौती भी जुड़ी होती है। गंगाजल लेने के बाद कांवड़िए बिना रुके अपने निर्धारित गंतव्य की ओर बढ़ते हैं और समय पर भगवान शिव का जलाभिषेक करने का संकल्प पूरा करते हैं।क्या होती है डाक कांवड़?डाक कांवड़ में कांवड़िए पहले वाहनों के जरिए हरिद्वार पहुंचते हैं। हरकी पैड़ी पर गंगा स्नान और पूजा-अर्चना के बाद पवित्र गंगाजल लेकर अपने गांव, शहर या निर्धारित शिवालय की ओर रवाना होते हैं। इस यात्रा की सबसे बड़ी खासियत है कि गंगाजल को जमीन पर नहीं रखा जाता। कांवड़िए लगातार आगे बढ़ते रहते हैं। एक कांवड़िया दौड़ता हुआ आगे जाता है और कुछ दूरी के बाद गंगाजल दूसरे कांवड़िए को सौंप देता है। इसी तरह पूरी टीम बारी-बारी से दौड़ते हुए यात्रा जारी रखती है। कई समूहों में दोपहिया वाहन भी साथ चलते हैं, ताकि कांवड़िए तेजी से दूरी तय कर सकें।दौड़ती कांवड़, दौड़ते कांवड़िए और तय समय का लक्ष्यडाक कांवड़ को भगवान शिव के प्रति कठिन तपस्या, अनुशासन और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि सावन में पवित्र गंगाजल से भगवान शिव का जलाभिषेक करने से भक्तों की मनोकामना पूरी होती है। इसी आस्था के चलते डाक कांवड़ियों के लिए समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। गंगाजल को निर्धारित समय के भीतर गंतव्य तक पहुंचाने के लिए पूरी टीम लगातार आगे बढ़ती रहती है। अंतिम दिनों में हरिद्वार से निकलने वाले कांवड़ मार्गों और हाईवे पर यही नजारा सबसे ज्यादा दिखाई देता है, कहीं कांवड़िया दौड़ता नजर आता है तो कहीं उसके पीछे बाइक दौड़ती दिखाई देती है।शास्त्रों में डाक कांवड़ का उल्लेख नहीं!डाक कांवड़ को लेकर एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि शास्त्रों में डाक कांवड़ का कोई स्पष्ट वर्णन नहीं मिलता। हालांकि भगवान परशुराम और श्रवण कुमार से जुड़ी कांवड़ परंपरा की कथाएं जरूर प्रचलित हैं। गंगाजल को जमीन पर न रखने और भगवान शिव के जलाभिषेक के लिए उसकी पवित्रता बनाए रखने की भावना के चलते कांवड़िए बिना रुके आगे बढ़ते हैं।दो दशक में तेजी से बढ़ा डाक कांवड़ का चलनबताया जाता है कि पिछले करीब दो दशकों में डाक कांवड़ का चलन तेजी से बढ़ा है। अब बड़ी संख्या में कांवड़िए वाहनों के जरिए हरिद्वार पहुंचते हैं और समूह बनाकर वापस लौटते हैं। एक कांवड़िया पैदल दौड़ता है, जबकि बाकी साथी बाइक या अन्य वाहनों के जरिए उसके साथ चलते हैं। कुछ दूरी तय करने के बाद गंगाजल दूसरे कांवड़िए को सौंप दिया जाता है। इस तरह बिना कांवड़ को जमीन पर रखे, लगातार दौड़ते हुए यात्रा पूरी की जाती है।आस्था भी, रफ्तार भी और संकल्प भीहरिद्वार में कांवड़ मेले के अंतिम दिनों में डाक कांवड़ का यह रूप श्रद्धा और रोमांच दोनों का अनोखा दृश्य प्रस्तुत करता है। हजारों कांवड़िए गंगाजल लेकर तेजी से अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे हैं। उनके लिए यह सिर्फ एक यात्रा नहीं, बल्कि भोलेनाथ के प्रति आस्था, संकल्प और समर्पण की दौड़ है।

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