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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · शाम 5:53 · नई दिल्ली संस्करण

किसान आंदोलन के चक्कर में बढ़ सकती हैं भाजपा सरकार की मुश्किलें

राष्ट्रीय सागर डेस्क4 मिनट का पठन

गणतंत्र दिवस के बाद किसान आंदोलन ने राकेश टिकैत के नेतृत्व में जो टर्न लिया है, उसके परिणामों को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। जानकारों का कहना है कि टिकैत ने जिस तरह से खुद को गाजीपुर बॉर्डर से बाहर निकालकर हरियाणा में ताबड़तोड़ किसान महापंचायत करनी शुरू की हैं, उससे मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर सरकार की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

प्रदेश में जिस तरह से उनकी महापंचायतों में गांवों से लोगों की भारी भीड़ जुट रही है, उसे देखकर कहा जाने लगा है कि मुख्यमंत्री खट्टर को टिकैत की नजर लग सकती है। किसान आंदोलन के चक्कर में भाजपा संकट में, अब किसानों के बीच से ऐसे नारे सुनाई पड़ रहे हैं। अखिल भारतीय आदर्श जाट महासभा के अध्यक्ष दीपक राठी कहते हैं कि टिकैत के कदमों पर सभी की नजर है। उन्होंने अभी तक जितनी भी महापंचायतें की हैं, वे सभी जाट बाहुल्य इलाकों में की हैं। हालांकि अभी चुनाव दूर हैं, लेकिन मौजूदा स्थितियों में टिकैत, हरियाणा की भाजपा-जजपा सरकार को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

किसान आंदोलन में शामिल रहे एक बड़े नेता, जिन्होंने बाद में इस आंदोलन से किनारा कर लिया, उनका कहना है कि राकेश टिकैत की चाल देखने लायक होगी। वे जिस तेजी से खुद को जाट नेता के तौर पर साबित करने की भूल कर रहे हैं, वह उन्हें किसान आंदोलन से जल्द ही दूर कर देगी। केंद्र सरकार इस आंदोलन के शुरू होने से लेकर इसके टिकैत मॉडल में समाहित होने तक एक ही बात की रट लगाए हुए है। यह आंदोलन तो ढाई प्रदेशों का है। हमें तो बाकी देश के किसानों की बात भी सुननी है। हैरानी की बात तो ये है कि पहले भी किसान नेताओं ने सरकार के इस भ्रम को तोड़ने का प्रयास नहीं किया और अब राकेश टिकैत ने तो सरकार की बात पर मुहर ही लगा दी है। टिकैत अभी तक जितनी भी महापंचायतों में शामिल हुए हैं, वे सभी जाट बाहुल्य इलाकों में हुई हैं।

कुरुक्षेत्र के गुमथला गढू की अनाज मंडी, जींद का कंडेला और चरखी-दादरी में राकेश टिकैत महापंचायत कर चुके हैं। अगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उन इलाकों को देखें, जहां पर आंदोलन को गति दी जा रही है, वहां भी जाट समुदाय का खासा प्रभाव है। शामली, बागपत, मथुरा, बिजनौर और दूसरे क्षेत्रों में राकेश टिकैत किसान महापंचायतों की गतिविधियां बढ़ा रहे हैं। इन क्षेत्रों में राकेश टिकैत, उनके भाई नरेश टिकैत या रालोद के जयंत चौधरी जैसे चेहरे ही आगे नजर आते हैं।

इसका मतलब है कि टिकैत ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के जाट समुदाय को एक मंच पर लाने की कवायद शुरू की है। हरियाणा में जिस तेजी से टिकैत ने जाट समुदाय के बीच अपनी पैठ बढ़ाई है, उससे भाजपा-जजपा सरकार के लिए परेशानी खड़ी हो सकती है। वजह, भाजपा से जाट समुदाय खासा नाराज है। पिछले साल विधानसभा उपचुनाव का नतीजा हो या स्थानीय निकायों का, इनमें भाजपा को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था। किसान आंदोलन के बाद हालत यह हो गई है कि भाजपा सरकार के मंत्रियों एवं दूसरे पदाधिकारियों को सार्वजनिक कार्यक्रमों में शिरकत करने के लिए पुलिस सुरक्षा लेनी पड़ रही है।

खट्टर का हेलीकॉप्टर तक नहीं उतरने दिया था

भाजपा को समर्थन दे रही जेजेपी के नेता भी अब किसान आंदोलन पर पैनी निगाह रख रहे हैं। अगर टिकैत, प्रदेश में किसान आंदोलन को यूं ही तेजी से बढ़ाते रहे तो आने वाले समय में जजपा भी राज्य सरकार को समर्थन जारी रखने के फैसले पर विचार कर सकती है। इसका कारण यह है कि जजपा का मुख्य वोट बैंक किसान समुदाय ही माना जाता है। ऐसे में जजपा, अपने वोट बैंक को खिसकने नहीं देगी। लोकसभा चुनावों में भले ही प्रदेश के किसान वर्ग, जिसमें जाट समुदाय का बाहुल्य है, ने सभी दस सीटें भाजपा की झोली में डाल दी थीं। उसके बाद विधानसभा चुनाव में खट्टर को जाट समुदाय की खासी नाराजगी का सामना करना पड़ा।

नतीजा, भाजपा अपने दम पर सरकार नहीं बना सकी। अब कुछ वैसी ही स्थिति बन रही है। राकेश टिकैत, प्रदेश सरकार के लिए मुसीबत का सबब बन सकते हैं। इस बाबत राकेश टिकैत का कहना है कि जो सरकार, किसानों का विरोध कर रही है तो वे उसे दोबारा अवसर क्यों देंगे। हम देश के सभी हिस्सों में किसान महापंचायत करेंगे।

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