अमोघ अस्त्र है, ब्रह्मास्त्र है नवार्ण मंत्र श्री नंदकिशोर श्रीमाली
अभी पुरुषोत्तम मास चल रहा है। ज्ञान, धर्म, दान, जप, तप आदि के लिस महत्वपूर्ण मास है और इस मास के अधिपति भगवान विष्णु हैं, जो संकट आने पर मानव जाति को बचाते हैं, उसकी रक्षा करते हैं। विष्णु सृष्टि की पालना करते हैं और भगवान विष्णु के दस अवतार हैं, जिसमें नौ अवतार अब तक हो चुके हैं। उस अवतार कड़ी में भगवान ने स्वयं गीता में कहा है-
यदा-यदाहि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम।।
अर्थात जब-जब इस संसार में धर्म की हानि होगी, तब मैं जन्म लेकर अवतरित होऊंगा। यह पुरुषोत्तम मास के अधिपति भगवान विष्णु की प्रतिज्ञा है। उनकी शक्ति तो अपरम्पार है...और दूसरे हमारे आराध्य महाकाल हैं, देवाधिदेव महादेव सदाशिव हैं, जिनकी हम नित्य स्तुति करते हैं। अब जब हमारे पास विष्णु हैं, शिव हैं तो हम नवरात्रि में शक्ति-साधना क्यों करें? यह प्रश्न सहज उठता है। लेकिन, जगत में तो समस्याएं हैं, बाधाएं हैं। ...और नवरात्रि में शक्ति की साधना ही बाधा समाधान का अमोघ अस्त्र है।
केवल तीन प्रकार की बाधाएं
आपकी बाधाओं के प्रश्न पर मैंने विचार किया और सार यह निकला कि मानव जीवन में केवल और केवल तीन प्रकार की बाधाएं हैं। पहली स्वास्थ्य ठीक नहीं है, दूसरी धन पूरा नहीं और तीसरी, घर और मन में शांति नहीं है। आपकी यह तीन समस्याएं हैं तो निश्चित रूप से आपको तीन शक्तियां चाहिए और त्रिशक्ति का अमोघ मंत्र है- '
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे'।
ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका।
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोस्तुते।।
चामुण्डा डण्डघाती च यैकारी वरदायिनी।
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणी।।
शिव ने की है मंत्र की व्याख्या
ऐे ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। इस नवार्ण मंत्र का विवेचन दुर्गा सप्तशती के ही सिद्ध कुंजिका स्तोत्र में आया है और श्लोक को रचित किया है भगवान शिव ने। भगवान शिव ने इस मंत्र की व्याख्या भी की है और उन्होंने कहा है कि- हे शक्ति, ऐें रूप में आप सृष्टिरूपा हैं, ह्रीं रूप में आप जगत का पालन करती हैं, क्लीं रूप में आज कामरूपा है। चामुण्डा रूप में बाधाओं का नाश करने वाली शक्ति हैं और विच्चे रूप में आप अभय प्रदान करने वाली शक्ति हैं। तो यह केवल साधारण मंत्र नहीं है, यह महामंत्र है, अमोघ अस्त्र है, ब्रह्मास्त्र है। गृहस्थ के लिए भी, सन्यासी के लिए भी कल्पतरु है यह मंत्र। नवार्ण मंत्र क्या है, हम मंत्र के द्वारा देवी का, शक्ति का आवाहन करते हैं, उनसे वातार्लाप करते हैं। हमारे पास वातार्लाप का माध्यम मंत्र है इसके लिए बीजाक्षर है, वह इष्ट का शाब्दिक स्वरूप है।
तो तीन स्वरूप क्या हुए? चित्र-विग्रह, यह कल्पना रूप है, हम उस कल्पना को एक मूल रूप देकर विग्रह स्थापित करते हैं कि यह आद्याशक्ति का स्वरूप है। द्वितीय मंत्र, शाब्दिक रूप और तीसरा है- यंत्र। यह हमारे इष्ट का ज्योमितीय स्वरूप है। तो इस मंत्र में भी बीजाक्षर है, वह इष्ट का शाब्दिक स्वरूप है। ठीक वैसे ही, जैसे आप किसी से बातचीत करते हो, नमस्ते, हेलो, वैसे ही मंत्र जप करते समय जो भी बीजाक्षर हैं, वह इष्ट से बात करने का मंत्र है। तो इस संसार का जो प्रचण्तम बीजाक्षर मंत्र है, उसमें तीन अक्षर हैं, ऐं, ह्रीं, क्लीं। ये तीनों बीजाक्षर तंत्र के आधार हैं। इनकी महिमा के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता, कुछ समझाया नहीं जा सकता। नवार्ण मंत्र की व्याख्या शब्दों से करना तो संभव ही नहीं है। इसका जप करने से ही यह मंत्र समझ में आता है, क्योंकि हम तब स्वयं अनुभव करते हैं। यह मंत्र अनुभव करने का मंत्र है। हां, मैं आपको यह कह सकता हूं कि मंत्र के संबंध में मंत्र दृष्टा ऋषि क्या कहते हैं? मंत्र दृष्टा ऋषि कहते हैं-
भोग और मोक्ष प्रदान करने वाली शक्ति
ऋषि कह रहे हैं कि हे देवी, आप भोग और मोक्ष, दोनों को प्रदान करने वाली हैं। शरण लेने वालों के लिए आप कल्याण प्रदायिनी हैं,। नवार्ण मंत्र के द्वारा हम महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती रूपी चंडिका का नमन करते हैं, जो हमें और अ-विद्या से मुक्त कर देती है। तो हमारे जीवन में अविद्या क्या है? अविद्या का अर्थ है- अज्ञान। अज्ञान क्या है, कि शक्ति के संबंध में हमारी जानकारी नहीं होना, उससे अनभिज्ञ होना। आप सभी लोग शक्ति को बाहर ढूंढते हैं, लेकिन शक्ति है कहां? शक्ति वास्तव में हमारे भीतर ही अवस्थित है।
आपके अन्दर है ब्रह्मलोक
वृहद अरण्य उपनिषद में एक बहुत सुंदर विवेचन आया है। जनक की सभा थी। शास्त्रार्थ था, याज्ञवल्क्य समेत कई ऋषि आये और सबने ब्रह्म के संबंध में व्याख्या की और अंत में प्रश्न के लिए ऋषि याज्ञवल्क्य की ही पत्नी गार्गी खड़ी हुईं। गार्गी प्रश्न पूछ रही हैं और याज्ञवल्क्य उत्तर दे रहे हैं। गार्गी ने प्रश्न पूछा कि, हे ऋषि- आप कह रहे हो कि यह सृष्टि, यह जगत जल से ओतप्रोत है तो जल किसमें डूबा हुआ है? तो ऋषि कहते हैं- अंतरिक्ष लोक में। गार्गी पुन: प्रश्न करती है तो फिर अंतरिक्ष लोक किसमें डूबा हुआ है? ऋषि कहते हैं- अंतरिक्ष लोक गंधर्व लोक में डूबा हुआ है। तो वो पूछती है गंधर्व किसमें डूबा हुआ है, तो वे कहते हैं गन्धर्व लोक अदित्य लोक में डूबा हुआ है। अब गार्गी प्रश्न पर प्रश्न पूछती जा रही है, यह चक्र चलता रहता है और बात यहां तक पहुंचती है कि सब कुछ ब्रह्मलोक में डूबा हुआ है। तो फिर गार्गी एकदम सटीक प्रश्न करती है कि ब्रह्मलोक किसमें डूबा हुआ है?... और ऋषि याज्ञवल्क्य क्रोधित हो जाते हैं, झल्ला जाते हैं कि तुम तो प्रश्न पर प्रश्न करती जा रही हो। बस, तुम मेरी इतनी सी बात मान लो कि ब्रह्म के संबंध में आगे कोई प्रश्न नहीं हो सकता है। पर, हर प्रश्न का जवाब है। जब कोई प्रश्न का जवाब हमारे पास नहीं होता है तो हम क्रोधित हो जाते हैं, यह मानव स्वभाव है, ऋषि स्वभाव है। गार्गी ने शांत भाव से कहा- हे ऋषि, ये ब्रह्मलोक शक्ति में डूबा हुआ है और यह ब्रह्म शक्ति से ओतप्रोत होता है।... और कहा कि यह ब्रह्म, हर व्यक्ति के अंतर में भीतर स्थित है। अब याज्ञवल्क्य हैं कि ब्रह्म को ढूंढ रहे हैं बाहर, और गार्गी कहती है कि ब्रह्मलोक है अन्दर। तो बात यह है कि यह जो अज्ञान है, वह क्या है, अपनी अन्तर-शक्ति से अनभिज्ञता, हमारे जीवन में त्रिशक्ति, नवार्ण मंत्र की अनभिज्ञता।
शिव का पंचाक्षरी मंत्र है- ऊँ नम: शिवाय, विष्णु सहस्राक्षर मंत्र है- ऊँ नमो नारायण, शक्ति के संबंध में- नवार्ण मंत्र। नौ अक्षर। ऐें ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। नव का अर्थ है- नया। नवार्ण अर्थात नवीन आवरण। पुराना आवरण छोड़कर फिर से नया बनना है। शक्ति के गर्भ में पुन: प्रवेश करना है। इसीलिए शक्ति को शक्ति को- या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता कहा गया है। जैसे एक बच्चा मां के गर्भ में 9 महीने सुरक्षित रहता है, इसी प्रकार नवरात्रि में साधक 9 दिन तक शक्ति के गर्भ में प्रवेश करता है और इस प्रवेश का शक्ति के क्षेत्र में रहने का मार्ग क्या है? नवार्ण।
शक्ति से ओत-प्रोत है ब्रह्मलोक
ब्रह्मलोक को शक्ति ने ही उठाया हुआ है, वह शक्ति से ही ओत-प्रोत है। शिव स्वयं शिव कहते हैं कि- शक्ति से युक्त होकर ही मैं इस संसार में क्रिया करने में समर्थ हो जाता हूं, विष्णु कहते हैं कि क्षीरसागर में योग निद्रा में रहता हूं तो मधु से रक्षा हेतु ब्रह्मा को पुकारना पड़ता है और तब ब्रह्मा स्तुति करते हैं- है शक्ति, त्वं स्वाहा, त्वं स्वधा, त्वं हि वषटकार: स्वरात्मिका...।
इतना निश्चित है कि ब्रह्मा जिस शक्ति की स्तुति कर रहे हैं, वह ब्रह्मलोक शक्ति में ही स्थित है। नवार्ण में तीन बीजाक्षर मंत्र हैं- तीनों- काली, लक्ष्मी और सरस्वती का स्वरूप हैं। काली महाकाल की, देवी लक्ष्मी भगवान विष्णु की और सरस्वती ब्रह्मा की शक्ति हैं। इसीलिए अपने अपनी शक्ति को समझाते हुए शक्ति स्वयं उद्घोषणा करती हैं- अहं ब्रह्मस्वरूपिणी। तो इसका सीधा-सादा अर्थ है-ब्रह्माण्ड की सारी शक्तियां नवार्ण मंत्र में आ गयी हैं, यही नवार्ण मंत्र की महिमा है।
शक्तिपात आवश्यक
अब, संसार की सरल भाषा में समझाता हूं। आपके बैंक अकाउंट में लाख रुपया हैं, आप अपना कार्ड लेकर जाते हो और आप पिन नंबर गलत डाल देते हो और फिर उल्टा सीधा नंबर डाल दोगे तो कार्ड ब्लॉक हो जाएगा। आपके पास ही है पैसा, आपका ही है, लेकिन नहीं प्राप्त हो सकता। बस, यही भूल साधक करते हैं कि नवार्ण मंत्र है उनके पास, लेकिन मंत्र की साधना नहीं करते। तो ब्रह्म की यह त्रि-शक्ति आपके भीतर है, लेकिन प्रकट क्यों नहीं हो रही है, आपके कार्य नहीं हो रहे हैं तो इसका सीधा अर्थ है कि आप पूर्ण मनोयोग के साथ नवार्ण साधना नहीं कर रहे हैं। आपके जीवन में नवार्ण साधना केवल मुख से बोली गई है, मन से की नहीं है, आपके जीवन में नवार्ण दीक्षा नहीं है। आज भी बड़े लोग बच्चों से पूछते हैं- अरे भाई, तुम्हारी शिक्षा-दीक्षा, कैसी चल रही है? जब पढ़ाई खत्म होती है, शिक्षा की पूर्णता होती है तो एक समारोह होता है- उसे कहते हैं दीक्षांत समारोह कहा गया है और यह दीक्षा की पूर्णता है, शिक्षा की पूर्णता नहीं है, शिक्षा तो जीवन भर चलता ही रहता है। लेकिन, दीक्षांत समारोह का अर्थ है कि एक विद्यार्थी अपने अध्यापक की, गुरु की छत्रछाया से बाहर निकलता है और फिर बाहर निकलेगा तो वह जीवन की धूप-छांव को अनुभव करेगा ही। हमारे जीवन की पाठशाला में कोई दीक्षांत समारोह नहीं होता है। साधक आजीवन गुरु की छत्रछाया में सुरक्षित रहता है। गुरु समय-समय पर साधक का मार्गदर्शन कर उसे उचित दिखाते रहते हैं। अब का चुनाव करना है या नहीं करना है, उस पर गुरु का कोई अधिकार नहीं है, गुरु कोई जोर-जबरदस्ती नहं करते, क्योंकि गुरु किसी को अपने अधीन भी नहीं बनाते कि तुझे तो मेरा कहना मानना ही पड़ेगा। गुरु अपने कर्तव्य का पालन करते हैं और शिष्य को शक्ति की ओर उन्मुख करते हैं।...यह नवार्ण मंत्र त्रि-शक्ति, ब्रह्म-शक्ति को प्राप्त करने का माध्यम है. पर केवल मंत्र जप से काम नहीं चलेगा। किताब में लिखा है और आपने मंत्र का उच्चारण कर लिया। क्योंकि, मंत्र हैं, उन्हें शिव ने कीलित कर दिया। उसे निष्कीलित करने के लिए गुरु के पास जाना ही पड़ता है। गुरु के सानिध्य में, गुरु की आज्ञा में शिक्षा, दीक्षा, साधना परम आवश्यक है। नवार्ण मंत्र शक्ति जागरण का मंत्र है, जीवन को सहज करने वाली एक नाव है। इसके लिए साधना आवश्यक है, दीक्षा आवश्यक है, शक्तिपात आवश्यक है, तप आवश्यक है। इस अग्नि को निरन्तर और निरन्तर जीवित रखना है। क्योंकि, दीक्षा का अर्थ ही तपना है। साधना और दीक्षा का जब मेल होता है, तब शक्ति का भाव हमारे ब्रह्म में, हमारे भीतर उद्भूत होता है,...और जीवन-यात्रा को सहज कराने वाली नाव नवार्ण साधना है। इसे निरंतर और निरंतर प्रज्वलित रखना है।
(साभार : निखिल मंत्र विज्ञान)
प्रस्तुति : विजय कुमार झा





