'बिहार में बोरा नहीं, बस्ता चाहिए' - फॉरवर्ड-बैकवर्ड की राजनीति पर प्रशांत किशोर ने साधा लालू-नीतीश पर निशाना
प्रशांत किशोर ने बिहार की राजनीति पर बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि पिछले 35 साल से बिहार की राजनीति सिर्फ 'फॉरवर्ड vs बैकवर्ड' के बंटवारे पर टिकी है। जाति के नाम पर वोट तो लिया गया, लेकिन शिक्षा नहीं दी गई। आज OBC के सिर्फ 9%, EBC के 7% और दलित-मुसलमानों के 5% से भी कम युवा 12वीं तक पढ़ पाते हैं। पीके ने कहा, इसी वजह से बिहार मजदूरों का प्रदेश बन गया और अब 'बोरा नहीं, बस्ता' चाहिए।

बिहार की राजनीति पर जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने एक बार फिर बड़ा हमला बोला है। पीके ने कहा कि पिछले 35 सालों से बिहार की पूरी राजनीति सिर्फ एक ही धुरी पर घूम रही है - 'फॉरवर्ड वर्सेस बैकवर्ड'। लालू-नीतीश के शासन में जाति के नाम पर वोट तो लिया गया, लेकिन जिन पिछड़ों के नाम पर सत्ता चलाई गई, उनके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई की किसी ने सुध नहीं ली। प्रशांत किशोर ने कुछ चौंकाने वाले आंकड़े रखे जो बिहार के शिक्षा सिस्टम की पोल खोलते हैं। उनके मुताबिक आज बिहार में OBC समुदाय के केवल 9 प्रतिशत युवा 12वीं कक्षा तक की पढ़ाई पूरी कर पाते हैं। यानी 100 में से 91 बच्चे 12वीं से पहले ही स्कूल छोड़ देते हैं।
इससे भी बुरी हालत EBC यानी अत्यंत पिछड़ा वर्ग की है, जहां यह आंकड़ा सिर्फ 7 प्रतिशत है। और दलित व मुसलमान समुदाय में तो स्थिति सबसे दयनीय है, जहां 5 प्रतिशत से भी कम बच्चे 12वीं पास कर पाते हैं। पीके का सवाल सीधा है - जब 35 साल तक आपने पिछड़ों, अतिपिछड़ों और दलितों के नाम पर राज किया, तो आपके अपने वोटर का बच्चा 12वीं तक क्यों नहीं पहुंच पाया? प्रशांत किशोर कहते हैं कि 1990 से शुरू हुई सामाजिक न्याय की राजनीति जरूरी थी, लेकिन वह सामाजिक न्याय सिर्फ नारा बनकर रह गया। नेताओं ने फॉरवर्ड को दुश्मन बताया और बैकवर्ड को अपना बताया, इससे वोट मिला, सत्ता मिली, लेकिन स्कूल नहीं बने, टीचर नहीं आए, और लैब, लाइब्रेरी तो दूर की बात है।
नतीजा आज ये है कि बिहार का गरीब बच्चा आज भी मजदूर बनने को मजबूर है। क्योंकि बिना 12वीं पास किए उसे न तो अच्छी नौकरी मिलेगी, न स्किल की ट्रेनिंग। वही बच्चा जो पटना में फॉरवर्ड-बैकवर्ड की बहस सुनता है, वह कोटा, दिल्ली और पंजाब में जाकर बोरा ढो रहा है। पीके ने कहा कि इसी सच्चाई को बदलने के लिए जन सुराज 'बोरा नहीं, बस्ता' की बात कर रहा है। उन्होंने कहा कि चुनाव चिन्ह के तौर पर मिला 'स्कूल बैग' सिर्फ निशान नहीं, बल्कि बिहार के भविष्य का एजेंडा है। जब तक बच्चा बस्ता लेकर स्कूल नहीं जाएगा, तब तक गरीबी, पलायन और बेरोजगारी खत्म नहीं होगी।
गौर करने वाली बात है कि प्रशांत किशोर पिछले 3 साल से बिहार में पदयात्रा कर रहे हैं। वह लगातार कहते आए हैं कि बिहार में सबसे ज्यादा एंटी-इनकंबेंसी है, क्योंकि 35 साल में दो ही चेहरे - लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार के इर्द-गिर्द ही पूरी राजनीति घूमती रही। उनकी विचारधारा, उनका वोट बैंक और उनका तरीका लगभग एक जैसा ही रहा। अब देखना है कि शिक्षा के इन आंकड़ों को हथियार बनाकर पीके बिहार के उस बड़े वोट बैंक को अपनी तरफ खींच पाते हैं या नहीं, जो 35 साल से सिर्फ जाति के नाम पर वोट देता आया है।




