गैर-हिंदुओं के मंदिर प्रवेश पर मद्रास हाई कोर्ट ने नेताओं को लगाई फटकार-'चमचागिरी के लिए मंदिर नहीं...'
मद्रास हाई कोर्ट ने कहा, मंदिर पर्यटन स्थल नहीं, आस्था के केंद्र हैं। जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और पी. मुरुगन की बेंच ने आदेश दिया कि बिना आस्था का लिखित वचनपत्र दिए गैर-हिंदू आगमिक मंदिरों के ध्वज-स्तंभ (कोदिमरम) से आगे प्रवेश नहीं कर सकते। कोर्ट ने TVK विधायक बदरुद्दीन के मीनाक्षी मंदिर में बिना नियम घुसने पर फटकार लगाई और कहा कि सदियों पुरानी परंपराएं चमचागिरी और सियासी दिखावे के आगे नहीं झुक सकतीं।

मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने तमिलनाडु के मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश को लेकर ऐतिहासिक और सख्त फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि मंदिर पर्यटन स्थल नहीं हैं, वे पवित्र आस्था के केंद्र हैं और उनकी पवित्रता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति पी. मुरुगन की खंडपीठ ने 23 अक्टूबर 2026 को यह आदेश मदुरै निवासी के. थंगम वेंकटेश की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि आगमिक मंदिरों में बिना नियमों का पालन किए गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाई जाए।
कोर्ट ने कहा कि जो गैर-हिंदू अपने धार्मिक चिह्न जैसे टोपी, क्रॉस आदि धारण करते हैं और संबंधित देवता के प्रति अपनी श्रद्धा व आस्था का लिखित वचनपत्र (Undertaking) नहीं देते, उन्हें आगमिक मंदिरों के ध्वज-स्तंभ (कोदिमरम / Flag-pole) के आगे प्रवेश की अनुमति नहीं दी जा सकती। बल्कि कोर्ट ने इससे भी आगे जाकर कहा कि ऐसे लोगों को मंदिर परिसर में भी प्रवेश नहीं देना चाहिए। पीठ ने अपने फैसले में तमिलनाडु मंदिर प्रवेश प्राधिकरण अधिनियम 1947 और हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम 1959 का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि अगर बिना शपथ-पत्र के गैर-हिंदुओं को प्रवेश दिया जाता है तो इससे मंदिर की पवित्रता भंग होगी।
फैसले के दौरान कोर्ट ने हाल की कुछ घटनाओं पर स्वत: संज्ञान लिया और नेताओं की कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने मदुरै सेंट्रल से TVK विधायक बदरुद्दीन मुस्तफा को लताड़ लगाई। कोर्ट ने कहा कि विधायक चुनाव जीतने के तुरंत बाद मीनाक्षी मंदिर के अंदर निरीक्षण के नाम पर घुस गए और कुम्भाभिषेकम के दौरान गोपुरम (शिखर) पर भी चढ़ गए, जबकि उन्होंने ही सनातन धर्म को खत्म करने का बयान दिया था। इसके अलावा तिरुवन्नामलाई के अरुणाचलेश्वर मंदिर में टोपी पहने लोगों के जबरन घुसने के वायरल वीडियो और तिरुचेंदुर मंदिर में एक ईसाई मंत्री के बिना शपथ-पत्र प्रवेश करने की घटना पर भी कोर्ट ने नाराजगी जताई और HR&CE विभाग के कर्मचारियों को मूकदर्शक बने रहने पर फटकार लगाई।
कोर्ट ने कहा, "मंदिर की सदियों पुरानी प्रथाएं और रीति-रिवाज ऐसे चमचागिरी के प्रदर्शन और सियासी दिखावे (Display of Chamchagiri and Optics) के आगे कभी घुटने नहीं टेक सकते। राजनीतिक कारणों से मंदिर परंपराओं को ताक पर नहीं रखा जा सकता।" कोर्ट ने इसके विपरीत तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के उदाहरण की सराहना की। कोर्ट ने कहा कि मुख्यमंत्री विजय ने मीनाक्षी मंदिर और तिरुचेंदुर मंदिर में दर्शन से पहले नियमानुसार अपनी आस्था का वचनपत्र दिया। उनसे हिंदू धर्म अपनाने के लिए नहीं कहा गया था, केवल देवी के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने को कहा गया था। यही सच्चा समावेशी दृष्टिकोण है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह नियम केवल आगम शास्त्रों से चलने वाले आगमिक मंदिरों पर लागू होगा, शिरडी साईं बाबा जैसे सर्वधर्म मंदिरों पर नहीं। मंदिर प्रशासन अपने अनुसार शपथ-पत्र का प्रारूप तैयार कर सकते हैं।
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