जनजातीय समाज का अभिन्न हिस्सा है मांदर /जन्म से लेकर मृत्यु तक मांदर के बिना कोई भी संस्कार नहीं पूरा होता
रांची। झारखंड की परंपरा-संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था में मांदर की मनमोहक गूँज का विशेष महत्व है और मांदर जनजातीय जीवन का अभिन्न हिस्सा है। जनजातीय समाज मे जन्म से लेकर मृत्यु तक मांदर के बिना कोई भी संस्कार पूरा नहीं होता। यही कारण है हमेशा से इस समाज को मांदर की जरूरत रही है और मांदर का निर्माण करनेवालों की भी। मांदर मे प्रकृति का गीत है, प्रेम का संगीत है,राष्ट्रप्रेम का ओज है..पुरातन संस्कृति की मौज है,वीरता का रस है..तो उलगुलान का सच भी है। मांदर जब बजता है..तो अनायास ही किसी त्योहार का एहसास होता है और पांव थिरकने लगते हैं..मानो पहाड़, पर्वत, वन, उपवन, नदियाँ, झरने.. सभी उत्सव मना रहे हों। देश की स्वाधीनता और बिरसा के जन आंदोलन का साक्षी है यह मांदर। मांदर का झारखंड की मिट्टी और यहाँ निवास करने वालों से गहरा नाता रहा है। यही वजह है कि आज भी यह मांदर अपने सैकड़ों सृजनकर्ताओं की परवरिश कर रहा है। मांदर का निर्माण करने वाले शंकर महली और जौरा महली ने बताया कि प्रत्येक मांदर की बिक्री में दो हजार रुपये की बचत हो जाती है। मांदर आधी आबादी के हक की भी बात करता है। मिट्टी की खोखली आकृति पर चमड़े की चादर भले ही पुरूष चढ़ाता हो, लेकिन जब तक घर की महिलाओं द्वारा लोढ़ा-पाटी पर पीसा गया खरन की मिट्टी का लेप उसपर नहीं चढ़ता.. मांदर के सुर बेसुरे ही रहते हैं। मांदर निर्माण में पुरुषों का सहयोग करने वाली अष्टमी देवी और जतरी देवी बताती है कि अभी मांदर बनाने का सीजन चल रहा है,ऐसे में वे सभी काफी व्यस्त हो जाती है। जनजातीय समाज मे मांदर की खास जगह है..यही कारण है कि प्रायः यहाँ हर घर की किसी दिवार पर एक मांदर टँगा जरूर मिलेगा। मौका सुख का हो या दुख का या कोई पर्व-त्योहार.. यहाँ तक कि घर मे आए मेहमान की आवभगत भी मांदर की थाप के बिना अधूरा ही रहता है।





