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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · सुबह 5:42 · नई दिल्ली संस्करण

हरेला: पर्यावरण संरक्षण का लोकपर्व

राष्ट्रीय सागर डेस्क5 मिनट का पठन
हरेला: पर्यावरण संरक्षण का लोकपर्व

देहरादून। उत्तराखंड अपनी समृद्ध लोक परंपराओं, कृषि संस्कृति और प्रकृति से गहरे जुड़ाव के लिए जाना जाता है। राज्य के पारंपरिक पर्व केवल धार्मिक आस्था के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक एकता और प्रकृति के प्रति सम्मान तथा कृतज्ञता का संदेश भी देते हैं।

उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र का प्रमुख लोक पर्व 'हरेला' हरियाली, खुशहाली और नए कृषि सत्र की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। यह राज्य के सबसे महत्वपूर्ण पारंपरिक त्योहारों में से एक है। इस वर्ष हरेला पर्व 16 जुलाई को मनाया जाएगा।

सावन महीने की शुरुआत में मनाया जाने वाला हरेला पर्व भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है।

कुमाऊं क्षेत्र में लोग इस त्योहार को पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाते हैं। धार्मिक महत्व के साथ-साथ यह पर्व पर्यावरण संरक्षण, जंगलों की रक्षा, जैव विविधता को बचाने और प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखने का संदेश भी देता है।

नैनीताल के डीएसबी कॉलेज के वनस्पति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. ललित तिवारी ने कहा कि हरेला वृक्षों, जंगलों और पर्यावरण के प्रति स्नेह और जिम्मेदारी की भावना को बढ़ावा देता है। उनके अनुसार, यह त्योहार लोगों को प्रकृति के साथ संतुलन में रहने का महत्व सिखाता है और समुदायों तथा उनके प्राकृतिक परिवेश के बीच संबंधों को मजबूत करता है।

हरेला पर्व की तैयारियां सावन शुरू होने से करीब नौ-दस दिन पहले ही शुरू हो जाती हैं। इस दौरान परिवार रिंगल (स्थानीय बांस) से बनी टोकरियों या मिट्टी के बर्तनों में हरेला के बीज बोते हैं। बीज बोने से पहले टोकरियों में तिमिल और मालू के पत्तों की परत बिछाई जाती है, फिर उसमें मिट्टी भरकर बीज डाले जाते हैं।

इसके बाद टोकरी में पांच या सात तरह के अनाज के बीज बोए जाते हैं। इनमें आमतौर पर जौ, गेहूं, धान, मक्का, गहत, सरसों, उड़द और भट्ट (काला सोयाबीन) शामिल होते हैं। कुछ ही दिनों में इन बीजों से हरे-भरे अंकुर निकल आते हैं।

ये अंकुर अच्छी फसल, खुशहाली और उत्तराखंड की समृद्ध प्राकृतिक और जैव विविधता के प्रतीक माने जाते हैं।

सावन के पहले दिन, जब कोंपलें पूरी तरह से उग जाती हैं, तो हरेला की कटाई की जाती है। इसे सबसे पहले कुल देवता को कृतज्ञता और भक्ति के प्रतीक के रूप में अर्पित किया जाता है।

इसके बाद, घर के बड़े-बुजुर्ग सभी परिवार के सदस्यों के लिए पारंपरिक हरेला अनुष्ठान करते हैं।

कुमाऊं क्षेत्र में हरेला पर्व का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। इस अवसर पर परिवार के बुजुर्ग हरेला के हरे अंकुरों को पैरों से लेकर सिर और कानों तक हल्के से स्पर्श कराते हैं।

इसके बाद वे इन अंकुरों को आशीर्वाद और शुभकामना के प्रतीक के रूप में कानों के पीछे लगा देते हैं।

इस अनुष्ठान के दौरान परिवार के बुजुर्ग पारंपरिक कुमाऊनी आशीर्वाद भी देते हैं। वे कामना करते हैं कि व्यक्ति लंबी उम्र पाए, हमेशा स्वस्थ और खुश रहे। उसकी जड़ें दुबक घास की तरह मजबूत हों, उसका जीवन पौल के पौधे की तरह फलता-फूलता रहे और उसमें सियार जैसी ताकत हो। साथ ही, वे आशीर्वाद देते हैं कि जब तक हिमालय पर बर्फ और गंगा में जल रहेगा, तब तक उसके जीवन में हरेला पर्व की खुशियां बनी रहें।

यह आशीर्वाद लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य, खुशहाली, ज्ञान और समृद्धि की कामना का प्रतीक है। साथ ही, यह इस विश्वास को भी दर्शाता है कि जैसे हिमालय पर हमेशा बर्फ रहती है और गंगा निरंतर बहती है, वैसे ही हरेला पर्व की खुशियां भी पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों के जीवन में बनी रहें।

डॉ. तिवारी ने बताया कि हरेला पर्व का सीधा संबंध खेती और मिट्टी की उर्वरता से है।

पारंपरिक मान्यता है कि हरेला के अंकुर जितने हरे-भरे और स्वस्थ होते हैं, आने वाले साल में फसल उतनी ही अच्छी होने की उम्मीद रहती है। पहाड़ी इलाकों के किसानों के लिए यह पर्व अच्छी पैदावार और जमीन की सेहत का शुभ संकेत माना जाता है।

खेती से गहरे जुड़ाव के कारण हरेला केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है। यह सदियों पुरानी कृषि परंपराओं का प्रतीक है और हमें याद दिलाता है कि मानव जीवन स्वस्थ पर्यावरण, उपजाऊ मिट्टी और प्रकृति पर निर्भर है।

हरेला पर्व की सबसे खास परंपराओं में से एक छायादार और फलदार पेड़ लगाना है। पीढ़ियों से लोग इस अवसर पर पौधारोपण करते आ रहे हैं।

यह परंपरा पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता को बढ़ावा देने और प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने का संदेश देती है।

आज के समय में जब जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई और जल संसाधनों की कमी जैसी गंभीर चुनौतियां सामने हैं, तब हरेला पर्व का संदेश पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

यह पर्व लोगों को याद दिलाता है कि जंगल, नदियां, मिट्टी और मानव जीवन एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसलिए आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा करना हम सभी की जिम्मेदारी है।

कुमाऊं की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा हरेला लोगों को अपनी परंपराओं, खेती और प्रकृति से जुड़े रहने की प्रेरणा देता है।

यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का सशक्त संदेश देने वाला लोक पर्व है, जो हरित, स्वस्थ और टिकाऊ भविष्य के सामूहिक संकल्प का भी प्रतीक है।

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