अमेरिका की इस नई चाल से ड्रैगन को लगा तगड़ा झटका, अब क्या करेगा चीन?

अमेरिका ने ईरान को आर्थिक रूप से कमजोर करने के लिए जो योजना तैयार की है, वह अब प्रभावी होती दिख रही है। ईरान का सबसे बड़ा कच्चे तेल का खरीददार चीन रहा है, लेकिन आने वाले दिनों में उसकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। पिछले लगभग एक दशक से अमेरिका के आर्थिक प्रतिबंध चीन को ईरान से तेल खरीदने से पूरी तरह रोकने में सफल नहीं हो पाए थे। चीन ने प्रतिबंधों के बावजूद कम कीमत पर ईरानी तेल खरीदने के रास्ते तलाश लिए थे, लेकिन अब ईरानी तेल टैंकरों को अमेरिकी मिसाइलों से निशाना बनाए जाने के बाद स्थिति तेजी से बदल रही है।
एक विश्लेषण के अनुसार, अमेरिकी नौसेना ने खार्ग द्वीप से तेल लोड कर रहे एक ईरानी टैंकर को निशाना बनाया है। खार्ग द्वीप वह प्रमुख केंद्र है, जहां से ईरान के लगभग 90 प्रतिशत तेल निर्यात की लोडिंग होती है। विश्लेषण के मुताबिक, यह पहली बार है जब अमेरिका ने केवल आर्थिक प्रतिबंध लगाने के बजाय, उस भौतिक आपूर्ति श्रृंखला को सीधे निशाना बनाया है, जिसके जरिए ईरान का तेल चीन की रिफाइनरियों तक पहुंचता है। यह कदम चीनी अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती पैदा कर सकता है। ईरान से मिलने वाला सस्ता तेल चीन की छोटी और स्वतंत्र रिफाइनरियां बड़े पैमाने पर खरीदती हैं, जिन्हें आमतौर पर टीपॉट रिफाइनरी कहा जाता है। ये रिफाइनरियां चीन में पेट्रोलियम उत्पादों के कुल उत्पादन का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा रखती हैं।
इन रिफाइनरियों ने अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने के लिए चीन की अपनी भुगतान व्यवस्था और डॉलर से अलग भुगतान के तरीकों का इस्तेमाल किया, जिसकी वजह से वे ईरान से उपलब्ध बड़ी मात्रा में तेल खरीदने में सफल रहीं। हालांकि, अब टैंकरों पर सीधे हमले से इनके सामने नई समस्या खड़ी हो गई है। अगर तेल ले जाने वाले जहाज ही नष्ट हो जाते हैं, तो केवल वैकल्पिक पेमेंट सिस्टम के सहारे आपूर्ति जारी रखना संभव नहीं होगा। समुद्र में डूब चुके जहाजों को चीन तुरंत वापस भी नहीं ला सकता, जिससे आपूर्ति में तत्काल बाधा आएगी।
यह स्थिति चीन के लिए और भी चिंताजनक है क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी अशांति के कारण वैश्विक बाजार में तेल की उपलब्धता पहले ही कम हुई है। ऐसे में चीन की इन टीपॉट रिफाइनरियों के पास भी तेल का स्टॉक घट रहा है, और ईरानी टैंकरों के डूबने का असर जल्द ही उनके परिचालन पर दिखाई देने की आशंका है। इन रिफाइनरियों का कारोबार बहुत कम मुनाफे पर चलता है और उनका बड़ा सहारा ईरानी जैसे प्रतिबंधित तेल पर मिलने वाली भारी छूट है। यही सस्ता तेल उन्हें बड़ी और मजबूत सरकारी रिफाइनरियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने में मदद करता है।





