सिकुड़ रहा है चांद, हर कोने में दरारें: NASA की 17 साल की तस्वीरों ने बढ़ाई Artemis मिशन की टेंशन
चांद की सतह पर 10,000 से ज्यादा नई दरारें मिली हैं। NASA के Lunar Reconnaissance Orbiter की 17 साल की तस्वीरों से पता चला कि चांद पिछले 40 करोड़ साल में 45 मीटर सिकुड़ गया है। स्मिथसोनियन के वैज्ञानिक थॉमस वाटर्स के मुताबिक, चांद का कोर ठंडा हो रहा है, जिससे इसकी सतह अंगूर की तरह सिकुड़ कर फट रही है। चांद single-plate है, इसलिए भूकंप कहीं भी आ सकता है। NASA के Artemis मिशन के लिए यह खतरे की घंटी है।

चांद को हम भले ही शांत और खूबसूरत मानते हों, लेकिन अंदर ही अंदर वह सिकुड़ रहा है और टूट रहा है। NASA की ताजा तस्वीरों ने वैज्ञानिकों को भी चौंका दिया है। चांद की सतह पर 10,000 से ज्यादा नई दरारें मिली हैं, जो किसी भी वक्त भूकंप ला सकती हैं। यह खुलासा 14 अक्टूबर को The Planetary Science Journal में प्रकाशित एक रिसर्च में हुआ है। रिसर्च स्मिथसोनियन नेशनल एयर एंड स्पेस म्यूजियम के वैज्ञानिक थॉमस आर. वाटर्स के नेतृत्व में की गई। टीम ने NASA के Lunar Reconnaissance Orbiter Camera (LROC) की पिछले 17 साल की लाखों तस्वीरों का विश्लेषण किया।
रिपोर्ट के मुताबिक चांद का आकार पिछले 40 से 80 करोड़ सालों में करीब 45 मीटर (148 फीट) तक सिकुड़ गया है। इसकी वजह है अंदर का ठंडा होना। जैसे अंगूर सूखकर किशमिश बनता है, वैसे ही चांद का कोर ठंडा होकर सिकुड़ रहा है और ऊपर की परत में झुर्रियां पड़ रही हैं। इन झुर्रियों को वैज्ञानिक lobate scarps और mare ridges कहते हैं। टीम को करीब 8,900 lobate scarps और 2,000 से ज्यादा छोटे ridges मिले हैं, कुल 10,000 से ज्यादा young faults। वाटर्स ने खुद कहा, "इतनी बड़ी संख्या की मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।" धरती पर 90% भूकंप टेक्टोनिक प्लेटों की सीमाओं पर आते हैं। लेकिन चांद एक single-plate body है, यानी पूरी एक अखंड खोल।
इसलिए यहां दरारें कहीं भी बन सकती हैं और moonquake कहीं भी आ सकता है। इसकी रफ्तार भले ही धीमी है - हर 10 लाख साल में 6 से 11 सेंटीमीटर - लेकिन यह लगातार जारी है। यह खोज NASA के लिए टेंशन बढ़ाने वाली है। Artemis मिशन के तहत इंसानों को फिर से चांद पर बसाने की योजना है। कुछ लैंडिंग साइट्स पहले से ही इन सक्रिय दरारों के पास हैं। अगर वहां भूकंप आया तो लैंडस्लाइड या बेस को नुकसान हो सकता है। राहत की बात यह है कि जहां चांद की परत मोटी है, वहां दरारें कम हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि वही जगहें भविष्य में बेस बनाने के लिए सबसे सुरक्षित होंगी।




