तकनीक का खूनी खेल: फारस की खाड़ी में अमेरिकी नौसेना की ईरान ने इस तरह निकाली हेंकड़ी

अरब सागर और फारस की खाड़ी का यह पानी अब महज़ कूटनीति के दांव-पेंच का अखाड़ा नहीं, बल्कि आधुनिक सैन्य तकनीक के सबसे खौफनाक इम्तिहान का मैदान बन चुका है। ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) द्वारा अमेरिकी विमानवाहक पोत (यूएसएस जॉर्ज वॉशिंगटन) और विध्वंसक पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागने का दावा महज़ एक और सैन्य झड़प नहीं है, बल्कि यह उस रणनीतिक समीकरण का टूटना है जिसे दशकों से अमेरिका की अजेय ताकत माना जाता था।
यह घटना मध्यपूर्व के संघर्ष को एक बिल्कुल नए और खतरनाक मोड़ पर ले आई है। अब तक खेल ड्रोन और सबसोनिक क्रूज मिसाइलों तक सीमित था, जिन्हें दुनिया के सबसे उन्नत माने जाने वाले अमेरिकी एजिस डिफेंस सिस्टम हवा में ही नेस्तनाबूद करने का दावा करते थे। लेकिन इस बार ईरान का सुपरसोनिक एंटी-शिप बैलिस्टिक मिसाइलों का पत्ता फेंकना यह चीख-चीख कर कह रहा है कि खेल बदल चुका है। यदि विशेषज्ञों के इन दावों में सच्चाई है कि ईरानी मिसाइलें अमेरिकी इंटरसेप्टर्स को चकमा देने में कामयाब रही हैं, तो यह पेंटागन की नींद उड़ाने के लिए काफी है। एक तरफ ईरान का यह दावा कि उसने अमेरिकी युद्धपोतों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया, तेहरान के दुस्साहस की नई पराकाष्ठा है।
वहीं दूसरी तरफ, ओमान की खाड़ी में अमेरिकी सेना द्वारा ईरान के कच्चे तेल के टैंकरों को चुन-चुनकर नेस्तनाबूद करना यह बताता है कि वाशिंगटन इस सीधी चुनौती पर बुरी तरह बौखलाया हुआ है। अमेरिका ने आर्थिक नाकेबंदी और टैंकरों को मलबे में बदलकर अपनी ताकत का अहसास कराने की कोशिश तो की है, लेकिन असली चिंता यह है कि सुपरसोनिक मिसाइलों के इस नए दौर ने खाड़ी में अमेरिकी नौसेना की वह पारंपरिक धौंस हमेशा के लिए कमजोर कर दी है, जिसके दम पर वह दशकों से इस जलडमरूमध्य पर राज करती आई थी।
जब महाशक्तियां अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए तकनीक के इस खूनी खेल में उतर आती हैं, तो सबसे बड़ा सवाल यह नहीं रहता कि कौन जीतेगा; असली खतरा इस बात का होता है कि इस तकनीकी अहंकार की आग में पूरी दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक अर्थव्यवस्था कितनी जल्दी भस्म हो जाएगी।





