मुख्य सामग्री पर जाएँ
ब्रेकिंग
Rajasthan Panchayat Election 2026: पंचायत चुनाव का ऐलान, 4 चरणों में होगी वोटिंग, जानिए पूरा शेड्यूलमुंबई में CJP का प्रदर्शन पड़ा भारी! जेल भरो आंदोलन पर FIR, आयोजकों में हड़कंपज्ञानेश कुमार पर चले लोकतंत्र की हत्या का मुकदमा! प्रमोद तिवारी का बड़ा हमलाBJP का झंडा उतारने वाले संजयन त्रिपाठी अब साइकिल पर सवार, समाजवादी पार्टी में हुए शामिलCM Yogi का बड़ा तोहफा: 4.60 लाख छात्रों के खाते में आई छात्रवृत्ति, आपके खाते में आई क्या? चेक करेंNoida: सुपरनोवा की 43वीं मंजिल से युवक ने लगाई छलांग, मौके पर दर्दनाक मौत, सोसाइटी में हड़कंपमुंबई प्रदर्शन के बाद CJP का दिल्ली कूच का ऐलान, अभिजीत दिपके ने कही ये बड़ी बातगठबंधन में फूट! रायबरेली से डरते थे राहुल गांधी! सपा नेता का बड़ा खुलासा, अखिलेश ने दी थी धमकी

सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · सुबह 6:08 · नई दिल्ली संस्करण

गांव की हालत ने बनाया अर्थशास्त्री,आदिवासी हो समाज के एक मात्र है प्रोफेसर

राष्ट्रीय सागर डेस्क1 मिनट का पठन
गांव की हालत ने बनाया अर्थशास्त्री,आदिवासी हो समाज के एक मात्र है प्रोफेसर

पश्चिम सिंहभूम। पश्चिम सिंहभूम जिला स्थित मंझारी प्रखंड के पिछड़े गांव बरकुंडिया में जन्मे डॉ. बलभद्र बिरुवा ने अपने बचपन में गांव की दयनीय आर्थिक स्थिति को करीब से देखा। यह स्थिति उनके जीवन का नया मोड़ साबित हुई, जिसने उन्हें अर्थशास्त्र के प्रति गहरी रुचि दी। शिक्षा को हथियार बनाकर उन्होंने संघर्ष की राह पर कदम बढ़ाया और आज दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रतिष्ठित सत्यवती कॉलेज (ऑफ कैंपस) में असिस्टेंट प्रोफेसर (इकॉनोमिक्स) के पद पर कार्यरत हैं। यहां वह भारतीय और वैश्विक अर्थव्यवस्था का ज्ञान बांट रहे हैं और विद्यार्थियों को नई सोच की दिशा दे रहे हैं। वे अपने हो समाज से है और अपने समाज के एक मात्र प्रोफेसर हैं।

नैक की ओर से ‘ए प्लस’ ग्रेडिंग प्राप्त इस पचास वर्ष पुराने कॉलेज में करीब 190 शिक्षकों के बीच डॉ. बिरुवा अकेले आदिवासी प्रोफेसर हैं, जो अपने समुदाय के लिए गर्व का विषय हैं। हालांकि वह वर्तमान में एडहॉक श्रेणी में कार्यरत हैं, लेकिन उनका समर्पण और मेहनत उन्हें छात्रों के बीच एक प्रेरणादायक शिक्षक बनाता है।

डॉ. बिरुवा ने ग्रेजुएशन संत जेवियर्स कॉलेज, रांची से, पोस्ट-ग्रेजुएशन जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी से और पीएचडी दिल्ली यूनिवर्सिटी से पूरी की। गांव की खस्ता अर्थव्यवस्था को देखकर अर्थशास्त्र को अपना विषय बनाने वाले डॉ. बिरुवा अब न केवल ज्ञान बांट रहे हैं, बल्कि अपनी कहानी से छात्रों को यह भी सिखा रहे हैं कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, इच्छाशक्ति और मेहनत से उन्हें बदला जा सकता है।

यह ख़बर दूसरों तक पहुँचाएँ

WhatsAppFacebookX

संबंधित ख़बरें