नंदीग्राम और रेजीनगर के घटनाक्रम ने बढ़ाई TMC की मुश्किलें, ममता बनर्जी के लिए बड़ी राजनीतिक अग्निपरीक्षा

पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर सेवान्तक और नाटकीय मोड़ देखने को मिल रहा है। आगामी विधानसभा उपचुनावों से ठीक पहले तृणमूल कांग्रेस (TMC) सुप्रीमो ममता बनर्जी को एक के बाद एक बड़े झटके लग रहे हैं। पार्टी में हुई आंतरिक बगावत, चुनाव आयोग के कड़े फैसलों और राजनीतिक रणनीतियों के फेर में ममता बनर्जी की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। ताजा घटनाक्रम के तहत, नंदीग्राम के बाद अब रेजीनगर सीट से भी ममता के प्रत्याशी के मैदान से बाहर होने की खबरें सामने आ रही हैं, जिससे पार्टी की चुनावी स्थिति और अधिक कमजोर पड़ती दिख रही है।
राज्य में आगामी 6 अक्टूबर को नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने हैं, जिसके लिए मतगणना 9 अक्टूबर को तय की गई है। इन उपचुनावों से पहले पार्टी के भीतर मचे घमासान और चुनाव आयोग द्वारा टीएमसी के नाम व 'घास पर दो फूल' वाले पारंपरिक चुनाव चिन्ह को फ्रीज किए जाने के बाद से ही ममता बनर्जी बैकफुट पर नजर आ रही हैं। आयोग ने दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों (ममता बनर्जी गुट और ऋतब्रत बनर्जी बागी गुट) को अलग-अलग नाम और नए चुनाव चिन्ह आवंटित किए हैं। इस तकनीकी और कानूनी पेच के बीच ममता गुट की ओर से नंदीग्राम सीट पर उतारी गई उम्मीदवार संचिता प्रधान (डे) ने अपना नामांकन वापस ले लिया। इसके साथ ही ममता बनर्जी ने घोषणा की कि उनकी पार्टी नंदीग्राम में कांग्रेस पार्टी का समर्थन करेगी।
नंदीग्राम के बाद अब रेजीनगर सीट के समीकरण भी तृणमूल प्रमुख के लिए अनुकूल नहीं दिख रहे हैं। रेजीनगर सीट पर ममता गुट ने रबीउल आलम चौधरी को मैदान में उतारा था, लेकिन लगातार बदलते राजनीतिक हालातों और विपक्षी दलों की आक्रामक घेराबंदी के कारण यहाँ भी पार्टी की स्थिति असहज होती जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी की मूल पहचान पर संकट और आंतरिक कलह के चलते ममता बनर्जी को अपने कदम पीछे खींचने पर मजबूर होना पड़ रहा है। यह उपचुनाव ममता बनर्जी के लिए सिर्फ दो सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि उनके राजनीतिक वर्चस्व और पार्टी पर नियंत्रण की एक बड़ी अग्निपरीक्षा बन चुका है। क्या ममता बनर्जी इन तमाम बाधाओं के बावजूद बंगाल की राजनीतिक जमीन पर अपनी पकड़ मजबूत रख पाएँगी? ये देखने वाली बात होगी।





