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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · सुबह 5:40 · नई दिल्ली संस्करण

पुरानी जमाबंदी पर बड़ा फैसला, 60 वर्ष बाद प्रशासनिक आदेश से नहीं होगी रद्द

राष्ट्रीय सागर डेस्क3 मिनट का पठन
पुरानी जमाबंदी पर बड़ा फैसला, 60 वर्ष बाद प्रशासनिक आदेश से नहीं होगी रद्द

रांची,। झारखंड उच्च न्यायालय ने हजारीबाग जिले के केरेडारी प्रखंड स्थित पांडु गांव की भूमि से जुड़े दो मामलों में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि लंबे समय से चली आ रही जमाबंदी को राजस्व अधिकारी प्रशासनिक आदेश के माध्यम से रद्द नहीं कर सकते। यदि राज्य सरकार को किसी जमाबंदी या भूमि बंदोबस्ती की वैधता पर संदेह है, तो उसे अपने अधिकार, स्वामित्व और हित के निर्धारण के लिए सक्षम सिविल न्यायालय का रुख करना होगा।

न्यायमूर्ति आनंद सेन की अदालत ने मोहम्मद जाहिद मियां और मोहम्मद शमीम मियां की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए हजारीबाग के तत्कालीन उपायुक्त द्वारा 23 अप्रैल 2017 को पारित जमाबंदी रद्द करने के आदेश को निरस्त कर दिया। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अभिजीत कुमार सिंह और अधिवक्ता हर्ष चंद्र ने पक्ष रखा।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि संबंधित भूमि का बंदोबस्त तत्कालीन जमींदार ने हुकुमनामा के माध्यम से किया था और वर्ष 1955 से उनके नाम पर नियमित रूप से जमाबंदी चल रही थी। उनका यह भी कहना था कि वे लगातार सरकारी लगान जमा करते रहे हैं। वर्ष 2013 में एनटीपीसी द्वारा भूमि अधिग्रहण के दौरान अपर समाहर्ता ने जांच के बाद उन्हें मुआवजा प्राप्त करने का वैध दावेदार भी माना था।

बाद में अंचल अधिकारी ने अपनी जांच रिपोर्ट में उल्लेख किया कि रजिस्टर-दो में जमाबंदी खोलने संबंधी आदेश का कोई उल्लेख नहीं है, भूमि रिटर्न दाखिल नहीं किया गया था और याचिकाकर्ता भूमि पर कब्जे में भी नहीं पाए गए। इसी रिपोर्ट के आधार पर उपायुक्त ने जमाबंदी को संदिग्ध मानते हुए उसे रद्द कर दिया।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि कथित बंदोबस्ती संदिग्ध है, क्योंकि बंदोबस्ती के समय याचिकाकर्ताओं की आयु मात्र चार-पांच वर्ष थी और जमाबंदी खोले जाने का कोई मूल अभिलेख उपलब्ध नहीं है।

इस पर उच्च न्यायालय ने कहा कि केवल रजिस्टर-दो में आदेश का उल्लेख नहीं होने, भूमि रिटर्न उपलब्ध नहीं होने अथवा अन्य संदेहों के आधार पर करीब 60 वर्षों से चली आ रही जमाबंदी को समाप्त नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि इस प्रकार का विवाद स्वामित्व और अधिकार से जुड़ा है, जिसका अंतिम निर्णय सक्षम सिविल न्यायालय ही कर सकता है।

अदालत ने अपने पूर्व के निर्णय स्टेट ऑफ झारखंड बनाम इजहार हुसैन का हवाला देते हुए दोहराया कि लंबे समय से प्रभावी जमाबंदी को समाप्त करने का अधिकार राजस्व अधिकारियों के पास नहीं है। इन्हीं टिप्पणियों के साथ न्यायालय ने उपायुक्त के दोनों आदेशों को रद्द करते हुए दोनों याचिकाएं स्वीकार कर लीं।

हालांकि, उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को यह स्वतंत्रता भी दी कि यदि वह संबंधित भूमि पर अपना अधिकार या स्वामित्व स्थापित करना चाहती है, तो सक्षम सिविल न्यायालय में वाद दायर कर सकती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सिविल न्यायालय के निर्णय के बिना लंबे समय से चली आ रही किसी भी जमाबंदी को प्रशासनिक स्तर पर निरस्त नहीं किया जा सकता।

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