लोकसभा चुनाव 2024: झारखंड के सिंहभूम लोकसभा सीट पर कभी एक पार्टी का वर्चस्व नहीं रहा
रांची। लोकसभा चुनाव का
बिगुल
कभी
भी
बज
सकता
है।
इसकी
हलचल
भी
तेज
हो
गई
है।
राज्य
में
प्रमुख
राजनीतिक
दल
अधिकाधिक
सीटों
पर
जीत
का
दावा
भी
ठोक
रहे
हैं
लेकिन
कोल्हान
प्रमंडल
के
सिंहभूम
लोकसभा
सीट
का
गणित
कुछ
अलग
ही
है।
यह
सीट
अनुसूचित
जनजाति
के
लिए
आरक्षित
है।
यह
संसदीय
क्षेत्र
कभी
झारखंड
पार्टी
का
गढ़
हुआ
करता
था
लेकिन
अब
यहां
के
मतदाता
किसी
एक
पार्टी
या
उम्मीदवार
पर
लगातार
भरोसा
नहीं
दिखाते
हैं।
इसलिए
यह
कहा
नहीं
जा
सकता
कि
यहां
किसका
पलड़ा
भारी
है।
सिंहभूम लोकसभा क्षेत्र में सरायकेला, चाईबासा, मझगांव, जगन्नाथपुर, मनोहरपुर और चक्रधरपुर विधानसभा सीटें शामिल हैं। सिंहभूम लोकसभा सीट पर पहली बार 1957 में लोकसभा चुनाव हुए थे। 1952 में देश में पहले लोकसभा चुनाव में सिंहभूम लोकसभा सीट शामिल नहीं थी। 1957 में हुए चुनाव में यहां से झारखंड पार्टी ने जीत दर्ज की। शंभू चरण ने 51.80 मत प्राप्त किया था जबकि निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर सीढ़ियां हेंब्रम ने 15.7 फीसदी मत प्राप्त किया था।
1962 में हुए लोकसभा चुनाव में झारखंड पार्टी ने ही जीत दर्ज की थी लेकिन इस बार झारखंड पार्टी ने अपने उम्मीदवार को बदल दिया था। इस बार यहां से हरिचरण सोय ने इस सीट पर जीत दर्ज की। उन्हें कुल 29.6 फीसदी मत मिले थे जबकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लाखों बोथरा को 26.5 फीसदी मत प्राप्त हुए थे। 1967 के लोकसभा चुनाव में यहां से निर्दलीय प्रत्याशी के बिरजू ने जीत दर्ज की थी, जिन्हें कुल 21.8 फीसदी मत मिले थे जबकि भारतीय जनसंघ को 19.3, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को 16.7 और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी को 16.5 फीसदी वोट प्राप्त हुए थे।
1971 की हुए लोकसभा चुनाव में ऑल इंडिया झारखंड पार्टी ने इस सीट पर जीत दर्ज की थी। उन्हें कुल 38.9 फीसदी वोट प्राप्त हुए थे। यहां से मोरन सिंह पूर्ति ने जीत दर्ज की थी जबकि निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर देवेंद्र नाथ चैंपियन को 24.3 फीसदी मत प्राप्त हुए थे। 1977 की लोकसभा चुनाव में यहां से ऑल इंडिया झारखंड पार्टी ने जीत दर्ज की। हालांकि, इस बार ऑल इंडिया झारखंड पार्टी ने अपनी उम्मीदवार का बदलाव किया था। बेगम समुराई को 70 फीसदी मत प्राप्त हुए थे जबकि इंडियन नेशनल कांग्रेस पार्टी से चुनाव लड़े मोहन सिंह पूर्ति को 13.5 फीसदी मत प्राप्त हुए थे। 1980 के लोकसभा चुनाव में सिंहभूम से जनता पार्टी की जीत हुई। यहां से बेगम समुराई ने 31.20 मत प्राप्त कर सीट पर जीत दर्ज की। जबकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस आई के खाते में 21.4 फीसदी मत मिले थे।
कांग्रेस ने 1984 में पहली बार जीत दर्ज की
1984 में
पहली
बार
भारतीय
राष्ट्रीय
कांग्रेस
ने
सीट
पर
जीत
दर्ज
की।
जब
उन्होंने
बेगम
समुराई
को
भारतीय
राष्ट्रीय
कांग्रेस
से
टिकट
दिया।
इस
बार
कांग्रेस
को
42.6 फीसदी
मत
यहां
प्राप्त
हुए
जबकि
निर्दलीय
के
तौर
पर
देवेंद्र
मांझी
को
17.7 फीसदी,
झारखंड
मुक्ति
मोर्चा
(झामुमो)
को
8.6 फीसदी
और
भाजपा
को
8.3 फीसदी
मत
प्राप्त
हुए।
1989 की
लोकसभा
चुनाव
में
भी
भारतीय
राष्ट्रीय
कांग्रेस
ने
ही
यहां
से
जीत
दर्ज
की।
बेगम
समुराई
को
29.3 फीसदी
मत
प्राप्त
हुए
थे,
जबकि
जनता
दल
को
22.4 झामुमो
को
22 फीसदी
मत
प्राप्त
हुए
थे।
झामुमो ने 1991 में दर्ज की जीत
1991 के
हुए
लोकसभा
चुनाव
में
इस
सीट
पर
झामुमो
ने
जीत
दर्ज
की
थी।
इस
सीट
से
कृष्णा
मरांडी
ने
35.30 प्रतिशत
मत
हासिल
कर
इस
सीट
पर
कब्जा
किया
था
जबकि
भारतीय
राष्ट्रीय
कांग्रेस
के
विजय
सिंह
सोए
कोई
21.8 फीसदी
और
भाजपा
को
20 फीसदी
मत
मिले
थे।
भाजपा 1996 में पहली दर्ज की जीत
1996 की
हुए
लोकसभा
चुनाव
में
सिंहभूम
सीट
से
भाजपा
ने
जीत
दर्ज
की।
इस
सीट
पर
चंद्रसेन
सिंकू
ने
जीत
दर्ज
किया।
इन्हें
कुल
20.1 फीसदी
वोट
मिले
थे
जबकि
झामुमो
को
12.5 और
भारतीय
राष्ट्रीय
कांग्रेस
को
11.2 फीसदी
रिपोर्ट
प्राप्त
हुए
थे।
कांग्रेस ने 1998 में फिर किया कब्जा
1998 की
लोकसभा
चुनाव
में
एक
बार
फिर
सिंहभूम
सीट
पर
भारतीय
राष्ट्रीय
कांग्रेस
ने
कब्जा
किया।
भारतीय
राष्ट्रीय
कांग्रेस
के
विजय
सिंह
सोय
को
35.4 फीसदी
वोट
मिले
जबकि
भाजपा
को
33.4 फीसदी
वोट
मिले।
झामुमो
23.7 फीसदी
मत
हासिल
किए।
1999 की
हुए
लोकसभा
चुनाव
में
भाजपा
ही
इस
सीट
पर
जीती।
हालांकि,
इस
बार
भाजपा
ने
अपने
उम्मीदवार
को
बदला
था
और
लक्ष्मण
गिलुआ
को
इस
सीट
से
मैदान
में
उतारा
था।
भाजपा
को
1999 के
चुनाव
में
कुल
45.9 फीसदी
वोट
मिले
थे
जबकि
भारतीय
राष्ट्रीय
कांग्रेस
को
30.9 और
झामुमो
को
14.8 फीसदी
मत
प्राप्त
हुए
थे।
बिहार से अलग होने के बाद पहली बार 2004 में लोकसभा के चुनाव हुए। पहले लोकसभा चुनाव में सिंहभूम की सीट फिर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के खाते में चली गई। यहां से बेगम समुराई ने जीत दर्ज की। यहां भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को 42.6 फीसदी वोट मिले। जबकि भाजपा के लक्ष्मण गिलुओ को 31.20 मत ही प्राप्त हुए। जबकि आजसू पार्टी को 2004 के लोकसभा चुनाव में कुल 14 फीसदी वोट प्राप्त हुए।
निर्दलीय उम्मीदवार मधु कोड़ा 2009 में जीते
2009 के
हुए
लोकसभा
चुनाव
में
इस
सीट
से
निर्दलीय
उम्मीदवार
मधु
कोड़ा
विजयी
हुए
जबकि
भाजपा
ने
अपने
उम्मीदवार
को
बदलकर
बरकुरवार
गागराई
को
मैदान
में
उतारा।
भाजपा
को
कुल
28.8 फीसदी
मत
प्राप्त
हुए
थे
जबकि
भारतीय
राष्ट्रीय
कांग्रेस
को
16.5 फीसदी
वोट
मिले
थे।
लक्ष्मण गिलुआ ने 2014 में दर्ज की जीत
2014 में
मोदी
के
लहर
का
असर
सिंहभूम
सीट
पर
भी
दिखा
और
एक
बार
फिर
भाजपा
ने
लक्ष्मण
गिलुआ
ने
जीत
हासिल
की।
इस
बार
भाजपा
ने
यहां
से
38.8 फीसदी
मत
प्राप्त
किया
जबकि
जय
भारत
समता
पार्टी
की
गीता
कोड़ा
ने
27.1 प्रतिशत
मत
प्राप्त
किया
था।
हालांकि,
इससे
पहले
निर्दलीय
उम्मीदवार
के
तौर
पर
गीता
कोड़ा
के
पति
मधु
कोड़ा
ने
2009 के
लोकसभा
चुनाव
में
सिंहभूम
सीट
से
निर्दलीय
उम्मीदवार
के
तौर
पर
जीत
दर्ज
किया
था।
सांसद गीता कोड़ा के लिए जीत की राह आसान नहीं
2019 के
लोकसभा
चुनाव
में
इस
सीट
पर
भारतीय
राष्ट्रीय
कांग्रेस
की
गीता
कोड़ा
ने
जीत
दर्ज
की।
गीता
कोड़ा
को
कुल
49.8 फीसदी
वोट
मिले
जबकि
भाजपा
को
40.9 फीसदी
मत
प्राप्त
हुए।
हालांकि,
अब
गीता
कोड़ा
26 फरवरी
को
भाजपा
में
शामिल
हो
गई
हैं।
सांसद गीता कोड़ा के भाजपा में जाने के बाद कोल्हान प्रमंडल में भाजपा को एक मजबूत नेता तो मिल गया है लेकिन गीता कोड़ा को यदि भाजपा 2024 में लोकसभा चुनाव में सिंहभूम से उम्मीदवार बनाती है, तो यह जीत दर्ज करा पाएंगी यह कह पाना वर्तमान स्थिति को देखते हुए मुश्किल कहा जा सकता है। क्योंकि, सीएम चम्पाई सोरेन भी कोल्हान प्रमंडल के सरायकेला विधानसभा से 2005 से चुनाव जीतते आ रहे हैं। ऐसे में चम्पाई सोरेन का प्रभाव इस पूरे क्षेत्र में है। हालांकि, पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा और उनकी पत्नी गीता कोड़ा का भी कोल्हान प्रमंडल के कई विधायकों से अच्छे संबंध है। अब देखना यह है कि जिस राह पर गीता कोड़ा चली हैं वह इतनी आसन नहीं है।





