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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · सुबह 7:06 · नई दिल्ली संस्करण

लोकसभा चुनाव 2024: झारखंड के सिंहभूम लोकसभा सीट पर कभी एक पार्टी का वर्चस्व नहीं रहा

राष्ट्रीय सागर डेस्क6 मिनट का पठन

रांची। लोकसभा चुनाव का

बिगुल

कभी

भी

बज

सकता

है।

इसकी

हलचल

भी

तेज

हो

गई

है।

राज्य

में

प्रमुख

राजनीतिक

दल

अधिकाधिक

सीटों

पर

जीत

का

दावा

भी

ठोक

रहे

हैं

लेकिन

कोल्हान

प्रमंडल

के

सिंहभूम

लोकसभा

सीट

का

गणित

कुछ

अलग

ही

है।

यह

सीट

अनुसूचित

जनजाति

के

लिए

आरक्षित

है।

यह

संसदीय

क्षेत्र

कभी

झारखंड

पार्टी

का

गढ़

हुआ

करता

था

लेकिन

अब

यहां

के

मतदाता

किसी

एक

पार्टी

या

उम्मीदवार

पर

लगातार

भरोसा

नहीं

दिखाते

हैं।

इसलिए

यह

कहा

नहीं

जा

सकता

कि

यहां

किसका

पलड़ा

भारी

है।

सिंहभूम लोकसभा क्षेत्र में सरायकेला, चाईबासा, मझगांव, जगन्नाथपुर, मनोहरपुर और चक्रधरपुर विधानसभा सीटें शामिल हैं। सिंहभूम लोकसभा सीट पर पहली बार 1957 में लोकसभा चुनाव हुए थे। 1952 में देश में पहले लोकसभा चुनाव में सिंहभूम लोकसभा सीट शामिल नहीं थी। 1957 में हुए चुनाव में यहां से झारखंड पार्टी ने जीत दर्ज की। शंभू चरण ने 51.80 मत प्राप्त किया था जबकि निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर सीढ़ियां हेंब्रम ने 15.7 फीसदी मत प्राप्त किया था।

1962 में हुए लोकसभा चुनाव में झारखंड पार्टी ने ही जीत दर्ज की थी लेकिन इस बार झारखंड पार्टी ने अपने उम्मीदवार को बदल दिया था। इस बार यहां से हरिचरण सोय ने इस सीट पर जीत दर्ज की। उन्हें कुल 29.6 फीसदी मत मिले थे जबकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लाखों बोथरा को 26.5 फीसदी मत प्राप्त हुए थे। 1967 के लोकसभा चुनाव में यहां से निर्दलीय प्रत्याशी के बिरजू ने जीत दर्ज की थी, जिन्हें कुल 21.8 फीसदी मत मिले थे जबकि भारतीय जनसंघ को 19.3, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को 16.7 और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी को 16.5 फीसदी वोट प्राप्त हुए थे।

1971 की हुए लोकसभा चुनाव में ऑल इंडिया झारखंड पार्टी ने इस सीट पर जीत दर्ज की थी। उन्हें कुल 38.9 फीसदी वोट प्राप्त हुए थे। यहां से मोरन सिंह पूर्ति ने जीत दर्ज की थी जबकि निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर देवेंद्र नाथ चैंपियन को 24.3 फीसदी मत प्राप्त हुए थे। 1977 की लोकसभा चुनाव में यहां से ऑल इंडिया झारखंड पार्टी ने जीत दर्ज की। हालांकि, इस बार ऑल इंडिया झारखंड पार्टी ने अपनी उम्मीदवार का बदलाव किया था। बेगम समुराई को 70 फीसदी मत प्राप्त हुए थे जबकि इंडियन नेशनल कांग्रेस पार्टी से चुनाव लड़े मोहन सिंह पूर्ति को 13.5 फीसदी मत प्राप्त हुए थे। 1980 के लोकसभा चुनाव में सिंहभूम से जनता पार्टी की जीत हुई। यहां से बेगम समुराई ने 31.20 मत प्राप्त कर सीट पर जीत दर्ज की। जबकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस आई के खाते में 21.4 फीसदी मत मिले थे।

कांग्रेस ने 1984 में पहली बार जीत दर्ज की

1984 में

पहली

बार

भारतीय

राष्ट्रीय

कांग्रेस

ने

सीट

पर

जीत

दर्ज

की।

जब

उन्होंने

बेगम

समुराई

को

भारतीय

राष्ट्रीय

कांग्रेस

से

टिकट

दिया।

इस

बार

कांग्रेस

को

42.6 फीसदी

मत

यहां

प्राप्त

हुए

जबकि

निर्दलीय

के

तौर

पर

देवेंद्र

मांझी

को

17.7 फीसदी,

झारखंड

मुक्ति

मोर्चा

(झामुमो)

को

8.6 फीसदी

और

भाजपा

को

8.3 फीसदी

मत

प्राप्त

हुए।

1989 की

लोकसभा

चुनाव

में

भी

भारतीय

राष्ट्रीय

कांग्रेस

ने

ही

यहां

से

जीत

दर्ज

की।

बेगम

समुराई

को

29.3 फीसदी

मत

प्राप्त

हुए

थे,

जबकि

जनता

दल

को

22.4 झामुमो

को

22 फीसदी

मत

प्राप्त

हुए

थे।

झामुमो ने 1991 में दर्ज की जीत

1991 के

हुए

लोकसभा

चुनाव

में

इस

सीट

पर

झामुमो

ने

जीत

दर्ज

की

थी।

इस

सीट

से

कृष्णा

मरांडी

ने

35.30 प्रतिशत

मत

हासिल

कर

इस

सीट

पर

कब्जा

किया

था

जबकि

भारतीय

राष्ट्रीय

कांग्रेस

के

विजय

सिंह

सोए

कोई

21.8 फीसदी

और

भाजपा

को

20 फीसदी

मत

मिले

थे।

भाजपा 1996 में पहली दर्ज की जीत

1996 की

हुए

लोकसभा

चुनाव

में

सिंहभूम

सीट

से

भाजपा

ने

जीत

दर्ज

की।

इस

सीट

पर

चंद्रसेन

सिंकू

ने

जीत

दर्ज

किया।

इन्हें

कुल

20.1 फीसदी

वोट

मिले

थे

जबकि

झामुमो

को

12.5 और

भारतीय

राष्ट्रीय

कांग्रेस

को

11.2 फीसदी

रिपोर्ट

प्राप्त

हुए

थे।

कांग्रेस ने 1998 में फिर किया कब्जा

1998 की

लोकसभा

चुनाव

में

एक

बार

फिर

सिंहभूम

सीट

पर

भारतीय

राष्ट्रीय

कांग्रेस

ने

कब्जा

किया।

भारतीय

राष्ट्रीय

कांग्रेस

के

विजय

सिंह

सोय

को

35.4 फीसदी

वोट

मिले

जबकि

भाजपा

को

33.4 फीसदी

वोट

मिले।

झामुमो

23.7 फीसदी

मत

हासिल

किए।

1999 की

हुए

लोकसभा

चुनाव

में

भाजपा

ही

इस

सीट

पर

जीती।

हालांकि,

इस

बार

भाजपा

ने

अपने

उम्मीदवार

को

बदला

था

और

लक्ष्मण

गिलुआ

को

इस

सीट

से

मैदान

में

उतारा

था।

भाजपा

को

1999 के

चुनाव

में

कुल

45.9 फीसदी

वोट

मिले

थे

जबकि

भारतीय

राष्ट्रीय

कांग्रेस

को

30.9 और

झामुमो

को

14.8 फीसदी

मत

प्राप्त

हुए

थे।

बिहार से अलग होने के बाद पहली बार 2004 में लोकसभा के चुनाव हुए। पहले लोकसभा चुनाव में सिंहभूम की सीट फिर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के खाते में चली गई। यहां से बेगम समुराई ने जीत दर्ज की। यहां भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को 42.6 फीसदी वोट मिले। जबकि भाजपा के लक्ष्मण गिलुओ को 31.20 मत ही प्राप्त हुए। जबकि आजसू पार्टी को 2004 के लोकसभा चुनाव में कुल 14 फीसदी वोट प्राप्त हुए।

निर्दलीय उम्मीदवार मधु कोड़ा 2009 में जीते

2009 के

हुए

लोकसभा

चुनाव

में

इस

सीट

से

निर्दलीय

उम्मीदवार

मधु

कोड़ा

विजयी

हुए

जबकि

भाजपा

ने

अपने

उम्मीदवार

को

बदलकर

बरकुरवार

गागराई

को

मैदान

में

उतारा।

भाजपा

को

कुल

28.8 फीसदी

मत

प्राप्त

हुए

थे

जबकि

भारतीय

राष्ट्रीय

कांग्रेस

को

16.5 फीसदी

वोट

मिले

थे।

लक्ष्मण गिलुआ ने 2014 में दर्ज की जीत

2014 में

मोदी

के

लहर

का

असर

सिंहभूम

सीट

पर

भी

दिखा

और

एक

बार

फिर

भाजपा

ने

लक्ष्मण

गिलुआ

ने

जीत

हासिल

की।

इस

बार

भाजपा

ने

यहां

से

38.8 फीसदी

मत

प्राप्त

किया

जबकि

जय

भारत

समता

पार्टी

की

गीता

कोड़ा

ने

27.1 प्रतिशत

मत

प्राप्त

किया

था।

हालांकि,

इससे

पहले

निर्दलीय

उम्मीदवार

के

तौर

पर

गीता

कोड़ा

के

पति

मधु

कोड़ा

ने

2009 के

लोकसभा

चुनाव

में

सिंहभूम

सीट

से

निर्दलीय

उम्मीदवार

के

तौर

पर

जीत

दर्ज

किया

था।

सांसद गीता कोड़ा के लिए जीत की राह आसान नहीं

2019 के

लोकसभा

चुनाव

में

इस

सीट

पर

भारतीय

राष्ट्रीय

कांग्रेस

की

गीता

कोड़ा

ने

जीत

दर्ज

की।

गीता

कोड़ा

को

कुल

49.8 फीसदी

वोट

मिले

जबकि

भाजपा

को

40.9 फीसदी

मत

प्राप्त

हुए।

हालांकि,

अब

गीता

कोड़ा

26 फरवरी

को

भाजपा

में

शामिल

हो

गई

हैं।

सांसद गीता कोड़ा के भाजपा में जाने के बाद कोल्हान प्रमंडल में भाजपा को एक मजबूत नेता तो मिल गया है लेकिन गीता कोड़ा को यदि भाजपा 2024 में लोकसभा चुनाव में सिंहभूम से उम्मीदवार बनाती है, तो यह जीत दर्ज करा पाएंगी यह कह पाना वर्तमान स्थिति को देखते हुए मुश्किल कहा जा सकता है। क्योंकि, सीएम चम्पाई सोरेन भी कोल्हान प्रमंडल के सरायकेला विधानसभा से 2005 से चुनाव जीतते आ रहे हैं। ऐसे में चम्पाई सोरेन का प्रभाव इस पूरे क्षेत्र में है। हालांकि, पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा और उनकी पत्नी गीता कोड़ा का भी कोल्हान प्रमंडल के कई विधायकों से अच्छे संबंध है। अब देखना यह है कि जिस राह पर गीता कोड़ा चली हैं वह इतनी आसन नहीं है।

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