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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · सुबह 8:37 · नई दिल्ली संस्करण

ज्योतिराव फुले का संघर्ष: शादी में अपमान के बाद शिक्षा से छेड़ी जातिवाद के खिलाफ लड़ाई

राष्ट्रीय सागर डेस्क3 मिनट का पठन
ज्योतिराव फुले का संघर्ष: शादी में अपमान के बाद शिक्षा से छेड़ी जातिवाद के खिलाफ लड़ाई

नई दिल्ली। यह बात साल 1848 की है, जब पुणे की एक संकरी सड़क से एक सवर्ण दोस्त की बारात बड़े धूमधाम से गुजर रही थी। उस सवर्ण दोस्त की बारात में शामिल होने पर जातिगत भेदभाव के कारण ज्योतिराव गोविंदराव फुले को 'शूद्र' बताकर धक्के देकर बाहर निकाल दिया गया था।

इस घटना के बाद ज्योतिराव ने एक ऐसा रास्ता चुना जिसने भारत का इतिहास बदल कर रख दिया। उन्होंने व्यक्तिगत तरक्की का मोह त्याग दिया और अपना पूरा जीवन इस अमानवीय व्यवस्था को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए समर्पित कर दिया।

​11 अप्रैल 1827 को जन्मे ज्योतिराव यह भली-भांति समझ चुके थे कि शूद्रों, अति-शूद्रों और महिलाओं की गुलामी का सबसे बड़ा कारण अज्ञानता है।

जब तक पिछड़े वर्ग को शिक्षा नहीं मिलेगी, वे शोषण को 'ईश्वर का विधान' ही मानते रहेंगे। फुले ने शिक्षा को 'तृतीय रत्न' (तीसरा नेत्र) कहा, जो अज्ञानता के जाले साफ कर वैचारिक आजादी देता है।

​उन्होंने बदलाव की शुरुआत अपने घर से की। 1848 में ही उन्होंने अपनी पत्नी सावित्रीबाई को घर पर पढ़ना-लिखना सिखाया।

उस दौर में जब महिलाओं और दलितों का किताबें छूना पाप माना जाता था, इस दंपति ने पुणे के भिड़ेवाड़ा में लड़कियों के लिए देश का पहला स्कूल खोल दिया। यह कोई आसान काम नहीं था। जब सावित्रीबाई स्कूल पढ़ाने के लिए निकलतीं, तो रूढ़िवादी ठेकेदार उन पर पत्थर, कीचड़ और गाय का गोबर फेंकते थे, लेकिन सावित्रीबाई अपने थैले में एक और साड़ी लेकर चलती थीं।

वे स्कूल पहुंचकर कपड़े बदलतीं और मुस्कुराते हुए लड़कियों को पढ़ातीं। इस दंपति ने अछूत माने जाने वाले महार और मांग समुदायों के लिए भी स्कूल खोले।

​फुले का संघर्ष केवल शिक्षा तक सीमित नहीं था। 19वीं सदी में बाल विवाह आम था। कई बच्चियां कम उम्र में विधवा हो जाती थीं। 1853 में फुले दंपति ने अपने ही घर को 'बालहत्या प्रतिबंधक गृह' बनाया। यह एक सुरक्षित पनाहगाह थी जहां कोई भी परित्यक्त महिला आकर बिना डरे अपने बच्चे को जन्म दे सकती थी।

यहीं पर काशीबाई नाम की एक ब्राह्मण विधवा ने एक बेटे को जन्म दिया, जिसे ज्योतिराव और सावित्रीबाई ने सीने से लगाकर गोद ले लिया। उसका नाम यशवंत रखा।

24 सितंबर 1873 को महात्मा फुले ने 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना की। सत्यशोधक समाज ने घोषणा की कि भगवान (जिसे फुले 'निर्मीक' कहते थे) और इंसान के बीच किसी भी पुरोहित या बिचौलिए की जरूरत नहीं है। क्या एक बच्चे को अपनी मां से बात करने के लिए किसी पंडित की जरूरत होती है? बिल्कुल नहीं। उन्होंने 'सत्यशोधक विवाह' ( बिना किसी पंडित, बिना खर्चीले रीति-रिवाजों और बिना संस्कृत मंत्रों के) शुरू करवाए। दूल्हा-दुल्हन अपनी मातृभाषा मराठी में एक-दूसरे के प्रति वफादारी और समानता की कसमें खाते थे, जिसमें दूल्हा विशेष रूप से पत्नी को आजादी और शिक्षा देने का वचन देता था।

​फुले एक जमीनी नेता होने के साथ-साथ एक महान विचारक भी थे। 1873 में उन्होंने अपनी विश्व-प्रसिद्ध किताब 'गुलामगिरी' लिखी। उन्होंने यह किताब अमेरिका में अश्वेतों की आजादी के लिए लड़ रहे लोगों को समर्पित की। वहीं, 1881 में आई उनकी किताब 'शेतकऱ्याचा आसूड' (किसानों का कोड़ा) में उन्होंने ब्रिटिश राज, भ्रष्ट नौकरशाही और साहूकारों के गठजोड़ का पर्दाफाश किया। उन्होंने सिर्फ समस्या नहीं गिनाई, बल्कि बांध बनाने, जल संरक्षण और किसानों को तकनीकी शिक्षा देने जैसे आधुनिक सुझाव भी दिए। यहां तक कि भारत के मिल मजदूरों को रविवार की जो छुट्टी आज मिलती है, वह भी फुले और उनके सहयोगी नारायण मेघाजी लोखंडे (बंबई मिल हैंड्स एसोसिएशन) के संघर्ष की ही देन है।

​समाज के प्रति उनके असीम योगदान को देखते हुए, 11 मई 1888 को जनता ने उन्हें 'महात्मा' की उपाधि से नवाजा। 1890 में लकवा मारने के बाद 63 वर्ष की आयु में इस महान योद्धा ने दुनिया को अलविदा कह दिया।

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