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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · रात 3:36 · नई दिल्ली संस्करण

पत्नी हत्या मामले में झारखंड हाई कोर्ट का अहम निर्णय, साक्ष्यों के अभाव में उम्रकैद की सजा रद्द, दोनों आरोपित बरी

राष्ट्रीय सागर डेस्क3 मिनट का पठन
पत्नी हत्या मामले में झारखंड हाई कोर्ट का अहम निर्णय, साक्ष्यों के अभाव में उम्रकैद की सजा रद्द, दोनों आरोपित बरी

रांची,। झारखंड उच्च न्यायालय ने पत्नी की हत्या से जुड़े एक पुराने आपराधिक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए हजारीबाग की निचली अदालत द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को रद्द कर दिया है। अदालत ने साक्ष्यों के अभाव और संदेह का लाभ देते हुए दोनों आरोपितों को दोषमुक्त कर दिया। यह निर्णय शुक्रवार को न्यायमूर्ति रंगन मुखोपाध्याय और न्यायमूर्ति दीपक रोशन की खंडपीठ ने सुनाया।उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा कि इस मामले में कोई भी प्रत्यक्षदर्शी गवाह उपलब्ध नहीं है। अभियोजन पक्ष की पूरी कहानी केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है, लेकिन ये साक्ष्य न तो आपस में जुड़कर एक पूर्ण श्रृंखला बनाते हैं और न ही इतने मजबूत हैं कि उनके आधार पर दोषसिद्धि को कायम रखा जा सके। अदालत ने कहा कि आपराधिक मामलों में केवल संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।दरअसल, यह दोनों आपराधिक अपीलें शत्रुघन प्रसाद डांगी और धानु भुइयां की ओर से दायर की गई थीं, जो हजारीबाग के आठवें अपर सत्र न्यायाधीश द्वारा वर्ष 2003 में दिए गए निर्णय के खिलाफ थीं। उच्च न्यायालय ने इन अपीलों को स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को निरस्त कर दिया।यह मामला वर्ष 2000 का है, जब शत्रुघन प्रसाद डांगी की पत्नी उषा देवी की हत्या कर दी गई थी। शुरुआत में पुलिस ने इसे लूटपाट के दौरान हुई हत्या बताया था, लेकिन जांच आगे बढ़ने पर आरोप लगाया गया कि शत्रुघन प्रसाद डांगी ने साजिश रचकर अपनी पत्नी की हत्या करवाई। इस कथित साजिश में धानु भुइयां को सह-आरोपित बनाया गया था।ट्रायल कोर्ट ने दोनों आरोपितों को भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। हालांकि, उच्च न्यायालय ने पाया कि सह-आरोपित धानु भुइयां के खिलाफ केवल सह-आरोपित के स्वीकारोक्ति बयान के अलावा कोई ठोस, स्वतंत्र और विश्वसनीय साक्ष्य मौजूद नहीं है, जिसे कानूनन स्वीकार नहीं किया जा सकता।अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि जिस चाकू की बरामदगी अभियोजन पक्ष द्वारा दिखाई गई थी, उसे न तो फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएल) भेजा गया और न ही यह प्रमाणित किया गया कि उसी हथियार से हत्या की गई थी। ऐसे में इस कथित बरामदगी को भी अदालत ने अविश्वसनीय माना।इसके अलावा, मृतका के माता-पिता द्वारा बताए गए वैवाहिक तनाव को भी उच्च न्यायालय ने हत्या का निर्णायक और ठोस कारण मानने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि मात्र वैवाहिक कलह के आधार पर हत्या जैसे गंभीर अपराध को सिद्ध नहीं किया जा सकता।चूंकि दोनों अपीलकर्ता पहले से ही जमानत पर थे, इसलिए उच्च न्यायालय ने उन्हें जमानत बंधन से भी मुक्त कर दिया। यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया में साक्ष्यों की मजबूती, निष्पक्ष जांच और दोषसिद्धि के लिए आवश्यक मानकों को रेखांकित करने वाला एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।--

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