एक युग का अंत! बलिया के 'बाबू साहब' चंद्रशेखर की विरासत 37 साल बाद संसद से बाहर
पूर्व पीएम चंद्रशेखर का परिवार 37 साल बाद संसद से बाहर हो गया है। भाजपा ने उनके बेटे नीरज शेखर का राज्यसभा टिकट काट दिया है। उनका कार्यकाल 25 नवंबर को खत्म हो रहा है। 1962 से चंद्रशेखर और 2007 से नीरज लगातार सदन में थे। 2019 में सपा छोड़ भाजपा में आए नीरज की बलिया में पकड़ कमजोर होने से टिकट कटा।

बलिया की राजनीति का एक बड़ा अध्याय खत्म हो गया है। करीब 37 साल बाद पहली बार ऐसा होगा जब संसद के किसी भी सदन में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर या उनके परिवार का कोई सदस्य नहीं होगा। भाजपा ने पूर्व पीएम के बेटे नीरज शेखर का राज्यसभा का टिकट काट दिया है, जिसके बाद उनका संसदीय सफर थमना तय है। दरअसल, नीरज शेखर का राज्यसभा कार्यकाल 25 नवंबर 2026 को खत्म हो रहा है। भाजपा ने इस बार यूपी की 10 राज्यसभा सीटों के लिए जिन उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की है, उसमें उनका नाम नहीं है। तीन बार राज्यसभा सांसद रह चुके नीरज के लिए यह बड़ा झटका है। इसी के साथ शेखर परिवार का 1989 से चला आ रहा लगातार प्रतिनिधित्व टूट जाएगा।
चंद्रशेखर का राजनीतिक सफर 1962 में शुरू हुआ था जब वह पहली बार राज्यसभा पहुंचे थे। 1962 से 1977 तक वह राज्यसभा में रहे। इसके बाद 1977 से 2007 तक उन्होंने बलिया लोकसभा सीट को अपना गढ़ बना लिया। इस दौरान वह 8 बार बलिया से सांसद चुने गए। सिर्फ 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति लहर में उन्हें एक बार हार का सामना करना पड़ा था। 1989 से 2007 तक वह लगातार सांसद रहे और देश के प्रधानमंत्री भी बने। 'युवा तुर्क' के नाम से मशहूर चंद्रशेखर का दबदबा ऐसा था कि बलिया उनकी कर्मभूमि बन गई थी। उनके निधन के बाद 2007 के उपचुनाव में उनके बेटे नीरज शेखर ने विरासत संभाली और बलिया से लोकसभा पहुंचे। 2009 में फिर जीते, लेकिन 2014 की मोदी लहर में वह बलिया से लोकसभा चुनाव हार गए।
लोकसभा हारने के बाद नीरज शेखर को समाजवादी पार्टी ने 2014 में राज्यसभा भेजा। लेकिन 2019 में उन्होंने बड़ा सियासी दांव खेला। राज्यसभा की सदस्यता और सपा दोनों से इस्तीफा देकर वह भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा ने उन्हें उसी साल फिर से राज्यसभा भेज दिया और 2020 में उनका कार्यकाल 2026 तक बढ़ा दिया। सूत्रों की मानें तो नीरज शेखर इस बार भी टिकट के लिए पूरी तरह आश्वस्त थे, लेकिन बलिया में जमीनी पकड़ कमजोर होने और परिवारवाद के आरोपों के बीच भाजपा नेतृत्व ने नए चेहरों को मौका देने का फैसला किया।
1989 से 2026 तक, चाहे लोकसभा हो या राज्यसभा, शेखर परिवार का कोई न कोई सदस्य सदन में जरूर रहा। 2014 में लोकसभा हारने के बाद कुछ महीनों का गैप जरूर आया था, लेकिन वह तुरंत राज्यसभा चले गए थे। अब भाजपा द्वारा टिकट काटे जाने के बाद 37 साल बाद पहली बार संसद शेखर परिवार के बिना होगी। बलिया में इसे एक युग के अंत के तौर पर देखा जा रहा है। कभी युवा तुर्क के नाम से दिल्ली की सियासत हिलाने वाले चंद्रशेखर की विरासत अब संसद से बाहर हो गई है।




