झारखंड में घटा भाजपा का वोट प्रतिशत, तीन सीटों का हुआ नुकसान

रांची,। झारखंड की 14 लोकसभा सीटों पर हुए चुनाव में भाजपा को झटका
लगा है। पिछले चुनाव में 11 सीट जीतने वाली भाजपा को तीन सीटों का नुकसान
हुआ है। भाजपा राज्य में आदिवासियों के लिए आरक्षित सभी पांच लोकसभा सीटें
गंवा दी है। इनमें तीन सीटों राजमहल, दुमका और सिंहभूम पर झामुमो और दो
सीटों खूंटी और लोहरदगा पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की है।
चुनाव में
झारखंड में भाजपा का सात प्रतिशत वोट भी घट गया है। यह पार्टी के लिए एक
बड़ा सेट बैक है। 2019 के चुनाव में 11 सीटें जीतने वाली भाजपा को 51.60
प्रतिशत वोट मिले थे। इसकी तुलना में 2024 में सिर्फ 44.60 प्रतिशत ही वोट
मिले हैं। गठबंधन के लिहाज से देखें तो झारखंड में आजसू के 2.62 वोट
प्रतिशत के साथ एनडीए को कुल 47.22 प्रतिशत वोट मिले।
झारखंड में
सात प्रतिशत वोट गंवाने के बावजूद एनडीए का वोट प्रतिशत इंडी गठबंधन से
ज्यादा रहा है। इस चुनाव में इंडिया गठबंधन में शामिल कांग्रेस को 19.19
प्रतिशत, झामुमो को 14.60 प्रतिशत, राजद को 2.77 प्रतिशत और भाकपा-माले को
2.41 प्रतिशत यानी कुल 38.97 प्रतिशत वोट मिले। इस लिहाज से एनडीए को
इंडिया गठबंधन की तुलना में 8.25 प्रतिशत ज्यादा वोट मिले।
वर्ष
2019 के लोकसभा चुनाव में झारखंड में ओवरऑल 66.8 प्रतिशत वोटिंग हुई थी। तब
सबसे ज्यादा वोटिंग दुमका सीट के लिए 73.43 और राजमहल सीट के लिए 72.05
प्रतिशत मतदान हुआ था। सबसे कम वोटिंग धनबाद सीट के लिए 60.47 प्रतिशत हुई
थी जबकि 2024 में चुनाव आयोग की तमाम कोशिशों के बावजूद 66.19 प्रतिशत ही
मतदान हुआ। इस चुनाव में भी दुमका में सबसे ज्यादा 73.87 प्रतिशत वोटिंग
हुई।
इन सीटों पर हुई सबसे ज्यादा अंतर से जीत
इस चुनाव में
कोडरमा सीट से भाजपा प्रत्याशी अन्नपूर्णा देवी सबसे ज्यादा वोट के अंतर
से जीतीं। उन्होंने 3,77,014 वोट के अंतर से इंडिया गठबंधन के भाकपा माले
प्रत्याशी विनोद कुमार सिंह को हराया। इस मामले में दूसरे नंबर पर धनबाद से
भाजपा प्रत्याशी ढुल्लू महतो रहे। पार्टी ने सीटिंग सांसद पीएन सिंह का
टिकट काटकर बाघमारा विधायक ढुल्लू महतो को मैदान में उतारा था और वे पार्टी
की उम्मीदों पर खरा उतरे। उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी अनुपमा सिंह को
3,51,583 वोट से हराया। तीसरी बड़ी जीत पलामू सीट पर दिखी। यहां भाजपा के
वीडी राम ने राजद के ममता भुइयां को 2,88,807 वोट से हराया। उन्होंने जीत
की हैट्रिक लगाई।
इन सीटों पर हुई सबसे कम अंतर से जीत
दुमका
सीट पर सबसे कम वोट के अंतर से हार-जीत हुई। यहां झामुमो के नलिन सोरेन ने
भाजपा की सीता सोरेन को 22,527 वोट के अंतर से हराया। सबसे कम अंतर से जीत
के मामले में दूसरा स्थान गिरिडीह सीट पर दिखा। यहां आजसू प्रत्याशी
चंद्रप्रकाश चौधरी ने झामुमो के मथुरा महतो को 88,880 वोट से हराया। इस
मामले में तीसरे स्थान पर गोड्डा से भाजपा प्रत्याशी निशिकांत दुबे रहे।
उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी प्रदीप यादव को 1,01,813 वोट से हराया।
इन पार्टियों का नोटा से कम रहा वोट प्रतिशत
इस
लोकसभा चुनाव में झारखंड की जनता ने नोटा में 1.14 प्रतिशत वोट डालकर
नाराजगी जताई। इसकी तुलना में ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम को 0.04 प्रतिशत,
बसपा को 0.92 प्रतिशत, सीपीआई को 0.31 प्रतिशत और सीपीएम को 0.22 प्रतिशत
वोट मिले। सबसे चौंकाने वाला नतीजा खूंटी सीट पर दिखा। यहां तो केंद्र में
मंत्री रहे अर्जुन मुंडा चुनाव हार गये।
सभी सीटों पर वोट प्रतिशत
भाजपा
44.60 फीसदी, कांग्रेस 19.19 फीसदी, झामुमो 14.60 फीसदी, आजसू 2.62 फीसदी,
राजद 2.77 फीसदी, बसपा 0.92 फीसदी, सीपीआई 0.31 फीसदी, सीपीआई (एमएल) 2.41
फीसदी, अन्य 11.17 फीसदी और नोटा 1.14 फीसदी।
इस संबंध में
राजनीतिक विशेषज्ञ ज्ञानवर्धन सिंह ने हिन्दुस्थान समाचार से विशेष बातचीत
में कहा कि भाजपा ने इस चुनाव में टिकट ऐसे उम्मीदवारों को थमाया है, जो
दूसरे दलों से पार्टी में आए थे। हालांकि, वे जीत भी नहीं पाए। टिकट का
बंटवारा भी सही तरीके से नहीं हुआ जबकि पार्टी ने बड़े-बड़े दिग्गजों को घर
बिठा दिया। इससे पार्टी के नेताओं-कार्यकर्ताओं में उपेक्षा का भाव बढ़ा।
बड़े नेताओं ने खुले तौर पर बगावत भले ही न की हो लेकिन वे चुनाव के दौरान
शिथिल हो गए। उनके समर्थकों ने भी चुनाव में सुस्ती दिखाई। इसका परिणाम हुआ
कि पार्टी का एक बड़ा वोट बैंक बाहर नहीं निकला। इसका पार्टी को नुकसान
हुआ।
ज्ञानवर्धन ने कहा कि भाजपा नेताओं की आपसी बातचीत में अब
'कांग्रेस वाली भाजपा' और 'आम आदमी पार्टी वाली भाजपा' जैसे जुमले कहे-सुने
जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि भाजपा ने पिछले दस सालों में अपने आपको पूरी
तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चेहरे पर निर्भर कर लिया। यह कॉर्पोरेट
कल्चर की 'ब्रांडिंग रणनीति' कही जाती है, जिसमें एक ब्रांड के चलने के
बाद उसके चाहे जितने आउटलेट खोले जाएं, वे बाजार में चल जाते हैं लेकिन
राजनीति में यह कॉर्पोरेट कल्चर नहीं चलता है।
ज्ञानवर्धन ने कहा
कि भारत जैसे विविधता वाले देश में अलग-अलग जातियों, समुदायों, वर्गों की
अलग-अलग प्राथमिकताएं होती हैं। इन्हें केवल एक ब्रांड के सहारे नहीं
संभाला जा सकता। भाजपा ने पिछले दिनों अपने बड़े-बड़े नेताओं को ठिकाने
लगाकर ऐसे नेताओं को बड़े पदों पर बिठाया है, जो अपने दम पर चुनाव जिताने
की क्षमता नहीं रखते।
ज्ञानवर्धन ने कहा कि विपक्ष के जरिए फैलाया
गया कि मोदी तीसरी बार आए तो संविधान बदल देंगे, आरक्षण खत्म कर देंगे और
देश में चुनाव नहीं होंगे। ये सब बातें ग्रामीण स्तर तक लोगों के बीच गईं।
इस भ्रम को भाजपा काट नहीं पाई। साथ ही झारखंड में चुनाव से ठीक पहले हेमंत
सोरेन का जेल जाना भी बहुत बड़ा वजह बना। आदिवासियों में इसको लेकर गुस्सा
था। साथ ही आदिवासियों को विपक्षी यह यकीन दिलाने में कामयाब रहे है कि
भाजपा उनकी जमीन छिनकर कॉरपोरेट को देगी।





