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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · सुबह 7:55 · नई दिल्ली संस्करण

एच-1बी वीजा पर 1 लाख डॉलर का वार्षिक शुल्क लगाने के ट्रंप के फैसले ने भारतीय आईटी कंपनियों के लिए खड़ी की नई मुसीबत

राष्ट्रीय सागर डेस्क2 मिनट का पठन

नई दिल्ली। एच-1बी वीजा पर 1 लाख डॉलर का वार्षिक शुल्क लगाने से जुड़े अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के फैसले के बाद अमेरिकी बाजार में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रखने वाले भारतीय आईटी शेयरों पर भारी दबाव आ गया। डोनाल्ड ट्रंप के इस कदम से कंपनियों के लिए भारतीय टेक्नोलॉजी पेशेवरों को नियुक्त करना पहले से अधिक महंगा हो जाएगा।

बीते कारोबारी दिन डोनाल्ड ट्रंप द्वारा एच-1बी वीजा आवेदनों के लिए 1,00,000 डॉलर शुल्क लगाने संबंधी आदेश पर हस्ताक्षर करने की तैयारी की खबरों के आते ही कई तकनीकी कंपनियों के शेयरों में गिरावट आ गई। देश की दिग्गज आईटी कंपनी इंफोसिस के शेयर 4.5 प्रतिशत गिर गए। कॉग्निजेंट टेक्नोलॉजी के शेयर 4.3 प्रतिशत, एक्सेंचर के शेयर 1.3 प्रतिशत और विप्रो के शेयर 3.4 प्रतिशत गिर गए।

दरअसल, भारतीय आईटी सर्विस प्रोवाइडर एच-1बी वीजा के सबसे बड़े उपयोगकर्ताओं में से हैं।

इन कंपनियों द्वारा उनकी अमेरिकी परियोजनाओं में भारत के कुशल कर्मचारियों को नियुक्त किया जाता है।

वहीं, ट्रंप द्वारा एच-1बी वीजा पर लगाया गया शुल्क कंपनियों के कॉस्ट-सेविंग मॉडल के लिए एक बड़ा खतरा बन जाएगा। एच-1बी वीजा अमेरिका में तीन वर्ष के लिए रोजगार प्रदान करता है और इसे तीन अतिरिक्त वर्ष के लिए बढ़ाया भी जा सकता है।

एच-1बी वीजा भारतीय तकनीकी कर्मचारियों के लिए अमेरिका में एक महत्वपूर्ण प्रवेश द्वार रहा है।

ट्रंप की नई घोषणा एच-1बी कैटेगरी के तहत देशी नागरिकों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाती है, जिसका इस्तेमाल खास कर विशिष्ट व्यवसायों में स्किल्ड प्रोफेशनल्स को नियुक्त करने के लिए किया जाता है।

नियोक्ताओं को अब पेमेंट का प्रमाण रखना जरूरी होगा, जिसे वीजा प्रॉसेस के दौरान राज्य सचिव द्वारा वेरिफाइ किया जाएगा।

उधर, इस फैसले की घोषणा करने के साथ ट्रंप का कहना है कि यह भारी शुल्क सुनिश्चित करेगा कि केवल अत्यंत कुशल लोगों को ही अमेरिका में एंट्री मिले। इससे कंपनियों द्वारा अमेरिकी कर्मचारियों की जगह दूसरे देशों से सस्ते कर्मचारियों को लाने पर भी रोक लगेगी।

ट्रंप ने अपनी घोषणा में कहा, "हमें वर्कर्स की जरूरत है, हमें अच्छे और बेहतरीन वर्कर्स की जरूरत है और इस फैसले के साथ यह सुनिश्चित हो सकेगा कि अमेरिका में बेहतर वर्कर्स ही काम कर सकें।"

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