Train Facts: प्लेन में सीट बेल्ट है, कार में भी, फिर ट्रेन में क्यों नहीं? वजह हैरान कर देगी
ट्रेन में सीट बेल्ट न होने की 3 बड़ी वजहें हैं। पहला, ट्रेन का वजन हजारों टन होता है, वो कार की तरह एक झटके में नहीं रुकती, उसका ब्रेकिंग डिस्टेंस 1 किमी तक होता है। दूसरा, हादसे में आग लगने या कोच पलटने पर सीट बेल्ट जानलेवा बन सकती है, बंधा होने से यात्री निकल नहीं पाएंगे। तीसरा, ट्रेन की सीटें Crashworthy डिजाइन की होती हैं जो खुद ही झटका सोख लेती हैं और लागत-प्रैक्टिकल दिक्कत भी एक कारण है।

आपने कभी सोचा है कि कार, बस और हवाई जहाज में सीट बेल्ट अनिवार्य है, लेकिन दुनिया की सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली ट्रेन में सीट बेल्ट क्यों नहीं दी जाती? जबकि ट्रेन भी तेज रफ्तार से चलती है और हादसे का खतरा उसमें भी रहता है। इसके पीछे 4 बड़ी वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग वजहें हैं। कार या बस में अचानक ब्रेक लगने पर आपका शरीर आगे की तरफ तेजी से झुकता है, इसीलिए सीट बेल्ट आपकी जान बचाती है। लेकिन ट्रेन का वजन हजारों टन होता है। इतनी भारी चीज एक झटके में नहीं रुकती। ट्रेन का ब्रेकिंग डिस्टेंस बहुत लंबा होता है। अगर ट्रेन 100 किमी/घंटा की रफ्तार पर है तो उसे पूरी तरह रुकने के लिए लगभग 500-1000 मीटर तक का सफर तय करना पड़ता है। यानी अचानक वाला जर्क कार जैसा नहीं लगता, इसलिए सीट बेल्ट की जरूरत उतनी नहीं महसूस होती।
ये सबसे बड़ा कारण है। रेलवे एक्सीडेंट में सबसे ज्यादा खतरा टक्कर के झटके से नहीं, बल्कि डिब्बों के पलटने और आग लगने से होता है। अगर हर यात्री ने सीट बेल्ट बांधी हुई है और ट्रेन में आग लग जाए या ट्रेन पलट जाए, तो सभी यात्री अपनी सीट पर फंस जाएंगे। ऐसे में भागना या निकलना नामुमकिन हो जाएगा। रेलवे का कॉन्सेप्ट है "Survival Space" और "Easy Evacuation"। यात्री को बंधा नहीं, बल्कि आजाद रखना ज्यादा सुरक्षित है ताकि हादसे के बाद वह तुरंत निकल सके। ट्रेन की सीटों को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि वो खुद एक सेफ्टी कुशन का काम करे। इसे "Crashworthy Design" कहते हैं। आपने देखा होगा ट्रेन की दो सीटों के बीच ज्यादा जगह नहीं होती और सीटें काफी मोटी और ऊंची होती हैं।
अगर झटका लगे तो आप अगली सीट से टकराएंगे, लेकिन सीट की गद्दी और डिजाइन उस झटके को सोख लेगी। इसे Compartmentalization थ्योरी कहते हैं। जैसे अंडे को डिब्बे में रखा जाता है ताकि टूटे नहीं। हवाई जहाज और बस में भी यही सिस्टम होता है, लेकिन वहां सीट बेल्ट एक्स्ट्रा सेफ्टी के लिए है। भारत में हर दिन 2.5 करोड़ से ज्यादा लोग ट्रेन में सफर करते हैं। एक ट्रेन में 72 से 80 सीटें एक कोच में होती हैं और एक ट्रेन में 22-24 कोच। रोज हजारों ट्रेनें चलती हैं। हर सीट पर सीट बेल्ट लगाना, उसे मेंटेन करना, और हर यात्री को बेल्ट लगाने के लिए मनवाना लगभग असंभव है। लोग इसे काट देंगे, गंदा कर देंगे या चोरी कर लेंगे। इसके अलावा भारतीय रेल में जनरल कोच में लोग खड़े होकर, फर्श पर बैठकर भी सफर करते हैं, वहां सीट बेल्ट का कोई मतलब ही नहीं रह जाता।
रेलवे सीट बेल्ट की जगह दूसरी टेक्नोलॉजी पर पैसा लगाता है। जैसे LHB कोच जो टक्कर पर एक-दूसरे के ऊपर नहीं चढ़ते, एयर ब्रेक सिस्टम, एंटी-क्लाइंबिंग फीचर और अब कवच सिस्टम जो दो ट्रेनों को टकराने से रोकता है। तो अगली बार जब ट्रेन में बैठें और सीट बेल्ट न दिखे तो समझ जाइए, ये लापरवाही नहीं, बल्कि सालों की रिसर्च और सेफ्टी इंजीनियरिंग का नतीजा है।
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