पलामू में है मध्यकालीन इतिहास की धरोहर
मेदिनीनगर। छोटी-छोटी पहाड़ियों, नदी-नालों एवं पेड़ों-झुरमुटों से घिरा गांव देवगन मध्यकालीन इतिहास, पुरातत्व एवं अध्यात्म का बेजोड़ संगम रहा है। कभी पलामू की राजधानी रह चुका यह गांव खरवारों,मार्हों,रक्सेलों,चेरों, मुगलों और अंग्रेजों के शासन का मूक साक्षी है। पलामू जिला मुख्यालय से 60 किमी तथा छत्तरपुर अनुमंडल मुख्यालय से 10 किमी दूर यह गांव मध्यकालीन इतिहास की जीवंत धरोहर है। गढ़, मंदिर, मस्जिद ,प्रस्तर मूर्तियां , कुएं, तालाब ,मेगालिथ आदि के अवशेष यहां बिखरे पड़े हैं। देवगन धाम का मुख्य मंदिर राम-लक्ष्मण मंदिर है। इस नाम से ख्यात देवगन धाम का मुख्य मंदिर प्रस्तर निर्मित और मध्यकालीन है। इस मंदिर की खोज 1966 ई में वृंदावनवासी गोविंद शरण दास ने खुदाई द्वारा की थी। उस समय यह जंगल से आच्छादित था। जंगल की सफाई करके इस प्रस्तर निर्मित मंदिर का पुनरुद्धार गोविंद शरण दास ने इसके गर्भगृह के ऊपर मीनार बनवाकर किया था। उनकी मृत्यु के उपरांत उनके अयोध्यावासी शिष्य साकेत बिहारी दास उर्फ़ फलाहारी बाबा ने 1999ई में मध्यकालीन ईंट- निर्मित सिंहासन पर शीशमहल बनवाकर राधा-कृष्ण की मनोहारी मूर्ति स्थापित की। समाधिस्थ बाबा गोविंद शरण दास की मूर्ति भी इसी परिसर में स्थापित है। इस मंदिर के निकट एक संग्रहालय है, जिसमें विष्णु अर्थात माधव,हलधर, सुभद्रा,महिषमर्दिनी दुर्गा, गणेश, शिवलिंग की पूजा करती दो नारियां तथा खंडित मूर्तियां विद्यमान हैं। लगभग 40 एकड़ में फैला यह मंदिर परिसर से अनेक खंडहरों, अवशेषों एवं कलाकृतियों से भरा पड़ा है।शंक्वाकार छोटी छोटी पहाड़ियों के अवशेष पर्यटकों एवं इतिहास प्रेमियों को चौंका देते हैं।
सचमुच यह स्तूप की तरह लगता है।इसी स्तूपनुमा लघु पहाड़ियों पर अनेक मंदिरों का खंडहर आज भी विद्यमान है, जिसमें सूर्य मंदिर,योगी-योगिनी मंदिर एवं गुर्जवा मंदिर उल्लेखनीय है। इतिहास के आईने में देवगन की चर्चा 13वीं शताब्दी से मिलती है। पलामू में रक्सेलों का प्रवेश पहली बार देवगन में 13वीं शताब्दी में हुआ था। इसके पूर्व असूरों,उरांवों, खरवारों एवं मार्हों ने इसे अपना आश्रय स्थल बनाया था।
आदिवासियों का प्राचीनकालीन मेगालिथ यहां अवस्थित है।मेगालिथ प्राचीनकालीन कब्र होता है , जिसमें मृतक दफनाये जाते थे। रक्सेलों के बाद देवगन चेरों राजाओं की राजधानी बना।रक्सेल रानी के गर्भ से उत्पन्न तेज राय और दरया राय ने तत्कालीन मुगलकालीन सूबेदार इंतिक़ाद खां से मिलकर देवगन पर कब्जा किया था। यह घटना 6 अक्टूबर1643 ई की है।बाद में मुगल अधिकारी जबरदस्त खां ने देवगन का प्रशासन धरणीधर उज्जैनिया को सुपूर्द किया । अंग्रेजी हुकूमत में 1771ई में संपूर्ण पलामू अंग्रेजों के अधीन हो गया था। कर्नल कैमक ने देवगन का रियासत पलामू के राजा गोपाल राय से लेकर सुगंध राय के वंशधरों को दे दिया। 19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में देवगन के प्रभावशाली जागीरदार शिवबक्श राय थे, जो अंग्रेजों के चाटूकार थे।
बहरहाल पलामू का गौरवशाली स्टेट रह चुका देवगन आज विकास के हाशिए पर खड़ा खड़ा अतीत के दुर्द्धर्ष संघर्षों तथा प्राचीनकालीन अवशेषों को समेटे अपनी पहचान की भीख मांग रहा है। प्रशासन का ध्यान नहीं होने के कारण देवगन अभिशप्त बन चुका है।सच यह है कि प्राकृतिक सौंदर्य से लबरेज और पहाड़ियों की सुषमाओं से घिरा देवगन फिल्म सिटी बन सकता है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा इसे संरक्षित किये जाने की आवश्यकता है।




