ऑक्सीजन की कमी से मचा हाहाकार, लिंडे के पूर्व उपाध्यक्ष ने पोस्ट लिख गिनाए कारण
देश में ऑक्सीजन का उत्पादन करने वाली बड़ी कंपनियों में से एक लिंडे के पूर्व उपाध्यक्ष हनुमान मल बेंगानी ने सोशल मीडिया पर पोस्ट लिख ऑक्सीजन संकट के कारण और निवारण गिनाए।
देश में बेकाबू हुई कोरोना वायरस की दूसरी लहर के कहर से कोहराम मचा हुआ है। कोरोना मरीजों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी के बीच राजधानी समेत देश के कई हिस्सों में ऑक्सीजन की किल्लत से हाहाकार मच गया है। देश में अब तक सैकड़ों मरीजों की ऑक्सीजन कमी से मौत हो चुकी है। भारत सरकार ऑक्सीजन संयंत्र लगाने और विदेश आयात करने तक मरीजों की जान बचाने के लिए हर संभव कदम उठा रही है। इस बीच, देश में ऑक्सीजन का उत्पादन करने वाली बड़ी कंपनियों में से एक लिंडे के पूर्व उपाध्यक्ष हनुमान मल बेंगानी ने सोशल मीडिया पर पोस्ट लिख ऑक्सीजन संकट के कारण और निवारण गिनाए।
लिंडे के पूर्व उपाध्यक्ष हनुमान मल बेंगानी ने ऑक्सीजन की किल्लत को लेकर सोशल मीडिया पर एक लंबा पोस्ट लिखा। उन्होंने लिखा, ''ऑक्सीजन उद्योग में मैंने अपनी जिंदगी के 45 साल गुजारे हैं। लिंडे के बिजनेस हेड के तौर पर भारत में ऑक्सीजन उत्पादन क्षमता 50 प्रतिशत तक बढ़ा दी थी। मैं अपने अनुभव और जानकारी के आधार पर कुछ तथ्य साझा कर रहा हूं, जो ऑक्सीजन संकट को समझने में आपकी मदद कर सकते हैंं।''
चिकित्सा और औद्योगिक ऑक्सीजन में अंतर
हनुमान मल बेंगानी ने बताया कि औद्योगिक और चिकित्सा ऑक्सीजन एक ही संयंत्र के उत्पाद हैं, जो एक ही टैंक और सिलेंडर में स्टोर किए जाते हैं। दोनों में ज्यादा अंतर नहीं है। मेडिकल ऑक्सीजन के लिए गैस कंपनी को प्रत्येक बैच का विश्लेषण कर प्रमाणित करना होगा। औद्योगिक कार्यों के लिए 99.5 फीसदी शुद्ध ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है, जबकि चिकित्सा क्षेत्र विशेषज्ञों के अनुसार, 93 फीसदी शुद्ध ऑक्सीजन की जरूरत होती है।
कहा- देश में नहीं है ऑक्सीजन की कमी
लिंडे के पूर्व उपाध्यक्ष ने कहा कि देश में ऑक्सीजन की कमी बिल्कुल भी नहीं है। आपको जानकर हैरानी होगी कि कुल ऑक्सीजन उत्पादन क्षमता में से केवल एक फीसदी से ऑक्सीजन चिकित्सा क्षेत्र में उपयोग की जाती है। कोरोना संकट में यह 5 फीसद तक उपयोग हो रही है, इससे ज्यादा नहीं।
एक लाख टन से ज्यादा है उत्पादन क्षमता
उन्होंने कहा, मेरे अनुमान के मुताबिक भारत में प्रतिदिन 100,000 टन कुल ऑक्सीजन उत्पादन हो रहा है, जिसमें 80 फीसदी ऑक्सीजन उत्पादन क्षमता स्टील कंपनियां कर रहीं हैं। जामनगर में रिलायंस की प्रतिदिन उत्पादन क्षमता 22000 टन है। देश में अधिकांश ऑक्सीजन संयंत्र मुंबई, गुजरात और कर्नाटक में हैं, जो आमतौर पर 5 से 10 फीसदी लिक्विट ऑक्सीजन का उत्पादन कर स्टोर करते हैं, जिसे ये संयंत्र बैकअप के तौर पर रखत हैं।
ऐसे की जाती है ऑक्सीजन की सप्लाई
उन्होंने बताया कि ऑक्सीजन को तीन तरीकों से उपयोगकर्ता तक पहुंचाया जाता है। 80 फीसदी ऑक्सीजन को संयंत्र से सीधे पाइप लाइन के जरिये, 15 फीसदी को टैंकर के माध्यम से और 5 फीसदी से कम को सिलेंडर के जरिये उपयोगकर्ताओं तक पहुंचाया जाता है।
देश में ऑक्सीजन के संकट का कारण
स्टोरेज उपकरणों की कमी: देश में ऑक्सीजन टैंकर और सिलेंडर की कमी है। इसकी वजह है कि ये महंगे हैं। एक टैंकर की कीमत करीब 45 लाख है। वहीं सिलेंडर की कीमत 10 हजार है, जिसमें 300 रुपये की ऑक्सीजन बेची जाती है।
प्रबंधन संबंधी कमियां: देश के ज्यादातर ऑक्सीजन दूर दराज इलाकों में स्थापित हैं, जहां से ग्राहकों तक ऑक्सीजन पहुंचाने के लिए टैंकरों को 200-1000 किलोमीटर की दूरी तय करनी होती है। कई जगह सड़कें ठीक न होने पर 7-10 दिन में सिलेंडर और टैंकर ग्राहकों तक पहुंच पाते हैं।
मुनाफाखोरी: ज्यादातर गैस कंपनियां मुनाफा होने पर ही संयंत्र में उत्पादन क्षमता बढ़ाती है।
संकट से उबरने के लिए ये 'हनुमान' के सुझाव दिए
सभी गैस कंपनियों से सख्ती से कहा जाए कि वे केवल एक दिन के लिए चिकित्सा उद्देश्य के लिए ही उत्पादन करें और उसे समय से ग्राहकों तक पहुंचाएं। इसके लिए सरकार गैस कंपनियों को सब्सिडी भी प्रदान कर सकती है।
रेलवे की ओर से बनाए गए ग्रीन कॉरिडोर के जरिये ही ऑक्सीजन को सभी राज्यों में पहुंचाया जाए।
सभी अस्पताल अपने यहां पीएसए कैप्टिव प्लांट लगा सकते हैं। पीएमओ ने सभी जिला अस्पतालों में करीब 500 ऑक्सीजन संयंत्र लगाने के लिए 200 करोड़ रुपये के बजट को मंजूरी दी है।
देश के ज्यादातर बड़े अस्पतालों के सीईओ सामान रूप से जिम्मेदारी उठाएं। वे जनता से इलाज के लिए भारी भरकम रकम वसूलते हैं, तो उन्हें संकट से निपटने के लिए बेहतर तैयारी भी करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि बड़े अस्पतालों के सीईओ को अपनी भूमिका निभानी चाहिए।





