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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · सुबह 5:09 · नई दिल्ली संस्करण

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एनएचआरसी की भूमिका पर उठाए गंभीर सवाल

राष्ट्रीय सागर डेस्क2 मिनट का पठन
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एनएचआरसी की भूमिका पर उठाए गंभीर सवाल

मदरसों की जांच का आदेश, लेकिन मॉब लिंचिंग पर स्वतः संज्ञान नहींप्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह आश्चर्यजनक है कि आयोग उत्तर प्रदेश के मदरसों की जांच जैसे मामलों में हस्तक्षेप कर रहा है, जबकि मॉब लिंचिंग, भीड़ हिंसा और सतर्कतावादी हमलों जैसे गंभीर मामलों में स्वतः संज्ञान लेने के उदाहरण सामने नहीं आते। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सरन की खंडपीठ ने यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें टीचर्स एसोसिएशन मदारिस अरबिया ने वर्ष 2025 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा उत्तर प्रदेश के 558 सहायता प्राप्त मदरसों के खिलाफ आर्थिक अपराध शाखा से जांच कराने के आदेश को चुनौती दी है।आयोग के समक्ष की गई शिकायत में आरोप लगाया गया कि संबंधित मदरसे अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से मानकों का पालन किए बिना सरकारी अनुदान प्राप्त कर रहे हैं तथा रिश्वत और कमीशन के माध्यम से अयोग्य शिक्षकों की नियुक्ति की जा रही है। याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में दलील दी कि कथित घटनाओं के एक वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद मानवाधिकार आयोग को जांच का आदेश देने का अधिकार नहीं है। इससे पहले अदालत इस आदेश पर अंतरिम रोक लगा चुकी है।मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि प्रथमदृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि राष्ट्रीय एवं राज्य मानवाधिकार आयोग उन मामलों में हस्तक्षेप कर रहे हैं, जो उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं। अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “यह अदालत इस बात से अवगत नहीं है कि मानवाधिकार आयोग ने ऐसे मामलों में स्वतः संज्ञान लिया हो, जहां सतर्कतावादी समूह कानून अपने हाथ में लेकर नागरिकों को प्रताड़ित करते हैं, या विभिन्न समुदायों के लोगों के आपसी संबंधों को लेकर उन्हें परेशान किया जाता है।”हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि जब मुस्लिम समुदाय के लोगों पर हमले, मॉब लिंचिंग या मामलों के सही पंजीकरण व जांच न होने जैसी घटनाएं सामने आती हैं तब मानवाधिकार आयोगों की निष्क्रियता चिंता का विषय है। खंडपीठ ने कहा कि मानवाधिकार आयोग कोई न्यायाधिकरण नहीं है, जो मुकदमों का परीक्षण करे। यदि उसे किसी मामले में हस्तक्षेप आवश्यक लगता है तो वह सक्षम अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है या एफआईआर दर्ज कराने का आग्रह कर सकता है, लेकिन ऐसे मामलों में कार्यपालिका को सीधे जांच के आदेश देने की उसकी शक्ति संदिग्ध है। खासकर जब मामला मानवाधिकार उल्लंघन का न हो।प्रथम दृष्टया यह मानते हुए कि आयोग ने ऐसे मामले में शिकायत स्वीकार की, जिसमें मानवाधिकार उल्लंघन का प्रश्न ही नहीं था, हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को नोटिस जारी किया और पूर्व में पारित अंतरिम आदेश को जारी रखा। मामले की अंतिम सुनवाई अब 11 मई 2026 को होगी।

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