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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · सुबह 9:21 · नई दिल्ली संस्करण

लाला लाजपत राय: विचार, संघर्ष और बलिदान की मिसाल, आर्य समाज से साइमन कमीशन तक का सफर

राष्ट्रीय सागर डेस्क5 मिनट का पठन
लाला लाजपत राय: विचार, संघर्ष और बलिदान की मिसाल, आर्य समाज से साइमन कमीशन तक का सफर

नई दिल्ली। हर साल की 28 जनवरी हमें उस व्यक्तित्व के जन्मदिन को याद दिलाती है जिसने विचार, कर्म, संघर्ष और बलिदान को एक साथ जीकर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा दी। 28 जनवरी, 1865 को पंजाब के लुधियाना जिले के धुदिके ग्राम में जन्मे लाला लाजपत राय केवल एक नेता नहीं थे, बल्कि बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी राजनीतिज्ञ, सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक, पत्रकार, वक्ता और सांसद थे। देश उन्हें पंजाब केसरी के नाम से जानता है।

उनके पिता राधा किशन उर्दू और फारसी के अध्यापक थे। माता गुलाब देवी धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं। पिता से उन्हें कर्त्तव्यनिष्ठा, उत्तरदायित्व, स्पष्टवादिता, ध्येयनिष्ठा, बलिदान और स्वतंत्रता का भाव मिला, जबकि माता से दानशीलता, विशालहृदयता, दयालुता और धर्मानुराग जैसे गुण विरासत में आए। यही संस्कार आगे चलकर उनके सम्पूर्ण जीवन और संघर्ष की नींव बने।

लाजपत राय की प्रारंभिक शिक्षा आंशिक रूप से घर और आंशिक रूप से विद्यालय में हुई।

वे सामान्यतः कक्षा में प्रथम आते थे, अनेक पुरस्कार जीते और शिक्षकों से स्नेह व प्रशंसा प्राप्त की। गांव के विद्यालय के बाद उन्होंने लुधियाना और अंबाला के मिशन स्कूलों से पढ़ाई की। खराब स्वास्थ्य और प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने हर शैक्षिक चरण में अपनी विशिष्टता बनाए रखी। स्कूल के दिनों से ही पठन, लेखन और व्याख्यान देने की लगन उनके भीतर समा गई थी, जो जीवनपर्यंत बनी रही।

पाठ्येत्तर गतिविधियों में उनकी गहरी रुचि और नेतृत्व क्षमता भी तभी से स्पष्ट हो गई थी।

वर्ष 1880 में उन्होंने लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज में प्रवेश लिया और साथ ही विधि कॉलेज में भी दाखिला लिया। 1883 में राजस्व न्यायालय में वकालत शुरू की। 1886 में पंजाब विश्वविद्यालय से प्लीडर की परीक्षा पास कर हिसार में वकालत आरंभ की और शीघ्र ही एक कुशल वकील के रूप में पहचान बना ली। 1882 में आर्य समाज की शिक्षा ग्रहण की और जल्द ही इसके अग्रणी नेताओं में शामिल हो गए।

कॉलेज जीवन के दो वर्ष इस दिशा में निर्णायक सिद्ध हुए। रोहतक में वे स्थानीय आर्य समाज के सचिव नियुक्त हुए और अपने प्रवास के दौरान रोहतक को आर्य समाज की गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र बना दिया।

उन्होंने आर्य समाज को एक व्यावहारिक सामाजिक सेवा संगठन का स्वरूप दिया और अकाल के समय राहत कार्यों के माध्यम से आत्मनिर्भरता और स्व-सहायता का संदेश दिया।

लाला लाजपत राय एक कर्मठ सामाजिक कार्यकर्ता और लोकहितैषी थे। 1896, 1899-1900, 1907-1908 के अकालों और 1905 के कांगड़ा भूकंप के दौरान उन्होंने पीड़ितों की सहायता में कोई कमी नहीं छोड़ी। वे प्रभावशाली समाज सुधारक भी थे।

अस्पृश्यता उन्मूलन के लिए उन्होंने आर्य समाज के अभियानों का समर्थन किया और बाद में महात्मा गांधी द्वारा स्थापित हरिजन सेवक संघ के साथ भी कार्य किया। उनका मानना था कि इस सामाजिक सुधार को राष्ट्रीय स्वीकृति दिलाने के लिए कठोर संघर्ष आवश्यक है।

दलित वर्गों को सम्मानजनक स्थिति दिलाने के लिए उन्होंने लाहौर में सेंट्रल होम और केन्द्रीय विद्यालयों हेतु भूमि खरीदी। 1908 में एकत्र अकाल राहत कोष की शेष राशि का उपयोग भी दलित उत्थान और प्राथमिक विद्यालयों के रख-रखाव में किया गया।

अनाथ और निराश्रित बच्चों के लिए अनाथालयों की स्थापना की उनकी योजनाओं को प्राधिकारियों की मान्यता और प्रशंसा मिली। समाज सुधारक के रूप में उनका स्थान समकालीन सुधारकों में अत्यंत ऊंचा था।

शिक्षा के क्षेत्र में भी उनका योगदान व्यापक था। आर्य समाज के शैक्षिक कार्यक्रमों और डीएवी कॉलेज को उन्होंने अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाया। उनका विश्वास था कि शिक्षा ही व्यक्ति के भविष्य की नींव है और प्रगति की कसौटी स्वतंत्रता का विकास है। लेखक के रूप में उनकी लेखनी सहज और प्रभावशाली थी।

1895 से 1900 के बीच उन्होंने मैजिनी, गैरीबाल्डी, शिवाजी और स्वामी दयानंद की जीवनियां लिखीं। अमेरिकी लेखिका मिस कैथरीन मेयो की पुस्तक “मदर इंडिया” के दुष्प्रचार का उन्होंने अनहैप्पी इंडिया के माध्यम से सशक्त उत्तर दिया।

1905 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने उन्हें भारतीय समस्याओं को ब्रिटिश जनता के समक्ष रखने के लिए प्रतिनिधि चुना। गोपालकृष्ण गोखले के साथ उन्होंने इंग्लैंड में राजनीतिक अभियान चलाया और तथ्यों व आंकड़ों के सहारे भारत की दुर्दशा को उजागर किया। बाद में अमेरिका जाकर उन्होंने शैक्षिक संस्थाओं का अध्ययन किया। उनका आदर्श भारतीय राष्ट्रीयता थी। दिसंबर 1905 के बनारस कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने बंगाल विभाजन और दमनकारी नीतियों का विरोध किया। लाल-बाल-पाल की त्रिमूर्ति के रूप में वे पहचाने जाने लगे।

स्वराज को भारत का जन्मसिद्ध अधिकार मानने की परिकल्पना भी इसी धारा की विरासत थी।

स्वदेशी आंदोलन के दौरान उन्होंने पंजाब में स्वदेशी का संदेश लोकप्रिय बनाया। सरकार विरोधी गतिविधियों के कारण 9 मई 1907 को उन्हें गिरफ्तार कर मांडले फोर्ट में कैद कर दिया गया। 1914 में ब्रिटिश दुष्प्रचार के विरुद्ध वे इंग्लैंड और फिर अमरीका गए। 1916 में उन्होंने इंडियन होम रूल लीग ऑफ अमेरिका की स्थापना की।

1920 में भारत लौटने के बाद तिलक स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स की स्थापना की। 1927 में साइमन कमीशन के बहिष्कार के दौरान 30 अक्टूबर 1928 को लाहौर में प्रदर्शन का नेतृत्व करते हुए वे लाठीचार्ज में गंभीर रूप से घायल हुए और 17 नवंबर 1928 को उनका निधन हो गया।

उनके शब्द 'मुझ पर किया गया लाठी का प्रत्येक प्रहार अंग्रेजी साम्राज्यवाद के ताबूत में एक-एक कील ठोकने के बराबर है' आज भी इतिहास में गूंजते हैं।

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