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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · सुबह 5:33 · नई दिल्ली संस्करण

मात्र 90 रुपए ने बदल दी थी गिरिजा देवी की किस्मत, ऐसे बनीं 'ठुमरी की रानी'

राष्ट्रीय सागर डेस्क3 मिनट का पठन
मात्र 90 रुपए ने बदल दी थी गिरिजा देवी की किस्मत, ऐसे बनीं 'ठुमरी की रानी'

नई दिल्ली। भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया में गिरिजा देवी ने अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी आवाज में भारतीय संगीत की आत्मा बसती थी। ठुमरी को देश-दुनिया में नई पहचान दिलाने वाली गिरिजा देवी ने उस समय संगीत की राह चुनी, जब समाज महिलाओं के मंच पर गाने को अच्छा नहीं मानता था। उन्होंने हर मुश्किल को पार करते हुए खुद को ऐसी ऊंचाई तक पहुंचाया कि लोग उन्हें 'ठुमरी की रानी' कहने लगे।

बहुत कम लोग जानते हैं कि उनके करियर की शुरुआत में ही उन्हें ऐसा सम्मान मिला था, जो उस दौर में सिर्फ बड़े कलाकारों को दिया जाता था। उनका पहला बड़ा रेडियो ऑडिशन करीब डेढ़ घंटे तक चला था, और उसके बाद उन्हें 90 रुपए मेहनताना मिला था, जो उस समय बहुत बड़ी बात मानी जाती थी।

गिरिजा देवी का जन्म 8 मई 1929 को वाराणसी के एक गांव में हुआ था। उनके पिता रामदेव राय एक जमींदार थे और संगीत के बड़े प्रेमी थे।

वह खुद भी संगीत सीखते थे और बड़े कलाकारों को सुनने के लिए बनारस जाया करते थे। छोटी गिरिजा भी उनके साथ संगीत सभाओं में जाती थीं। इस दौरान उनका झुकाव संगीत की ओर बढ़ता चला गया। यह देख उनके पिता ने समाज की परवाह किए बिना उन्हें संगीत सिखाने का फैसला लिया।

गिरिजा देवी ने महज पांच साल की उम्र में संगीत सीखना शुरू कर दिया था। उनके गुरु पंडित सरजू प्रसाद मिश्रा थे, जिन्होंने उन्हें 'ख्याल' और 'टप्पा' जैसी शास्त्रीय शैलियां सिखाईं। बचपन से ही वह घंटों रियाज करती थीं।

हालांकि घर में सभी लोग उनके संगीत सीखने के पक्ष में नहीं थे। उनकी मां और दादी चाहती थीं कि वह सामान्य लड़कियों की तरह घर-गृहस्थी पर ध्यान दें। लेकिन, उनके पिता ने हमेशा उनका साथ दिया।

जब भी गिरिजा देवी कोई नया राग सीखती थीं, तो पिता उन्हें इनाम में गुड़िया लाकर देते थे। यही प्यार और प्रोत्साहन उनके आत्मविश्वास की सबसे बड़ी ताकत बना। साल 1944 में उनकी शादी मधुसूदन जैन नाम के व्यापारी से हुई, जो उनसे उम्र में काफी बड़े थे। शादी के बाद भी संगीत का सफर नहीं रुका। उनके पति ने उनका साथ दिया। बाद में उन्होंने श्रीचंद मिश्रा से भी संगीत की शिक्षा ली और अपनी गायकी को और मजबूत बनाया।

गिरिजा देवी के जीवन का बड़ा मोड़ तब आया, जब साल 1949 में उन्हें इलाहाबाद रेडियो से बुलावा आया। उनका ऑडिशन करीब डेढ़ घंटे तक चला। उन्होंने राग देसी का ख्याल, ठुमरी और टप्पा गाया। ऑडिशन के बाद उन्हें जो पत्र मिला, उसमें 90 रुपए मेहनताना लिखा था। उस समय यह रकम सिर्फ बड़े और मशहूर कलाकारों को दी जाती थी। इसी से उन्हें एहसास हुआ कि रेडियो ने उन्हें सीधे टॉप कलाकारों की श्रेणी में रखा है।

इसके बाद उन्होंने साल 1951 में बिहार के आरा में अपना पहला बड़ा मंचीय कार्यक्रम किया। वहां मौजूद बड़े कलाकारों और संगीत प्रेमियों ने उनकी आवाज की खूब तारीफ की। धीरे-धीरे उनकी पहचान पूरे देश में बनने लगी। उन्होंने ठुमरी, दादरा, कजरी, चैती और होरी जैसी शैलियों को नई ऊंचाई दी।

उनकी गायकी में बनारस और पूर्वी उत्तर प्रदेश की संस्कृति की झलक साफ दिखाई देती थी।

गिरिजा देवी को संगीत में योगदान के लिए कई बड़े सम्मान मिले। उन्हें साल 1972 में पद्मश्री, 1977 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1989 में पद्म भूषण और 2016 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।

उन्होंने लंबे समय तक संगीत सिखाने का काम भी किया और नई पीढ़ी को भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपरा से जोड़े रखा।

24 अक्टूबर 2017 को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। लेकिन उनकी आवाज, उनकी ठुमरी और उनका संगीत आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है।

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