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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · सुबह 5:33 · नई दिल्ली संस्करण

जयपाल सिंह मुंडा: ओलंपिक में भारत की कप्तानी से संसद तक आदिवासियों की लड़ाई का यादगार सफर

राष्ट्रीय सागर डेस्क3 मिनट का पठन
जयपाल सिंह मुंडा: ओलंपिक में भारत की कप्तानी से संसद तक आदिवासियों की लड़ाई का यादगार सफर

नई दिल्ली। भारतीय हॉकी का इतिहास स्वर्णिम रहा है। इस स्वर्णिम इतिहास के बड़े चेहरों में एक नाम जयपाल सिंह मुंडा का है। जयपाल सिंह भारतीय हॉकी का बड़ा चेहरा रहे हैं और ओलंपिक में भारतीय टीम की कप्तानी कर चुके हैं। एक खिलाड़ी के तौर पर बड़ी सफलता पाने के बाद वह राजनीति के क्षेत्र में आए और वहां भी लंबी पारी खेली। जयपाल सिंह ने आदिवासियों के अधिकारों के लिए भी लंबी लड़ाई लड़ी।

जयपाल सिंह मुंडा का जन्म 3 जनवरी 1903 को रांची में हुआ था। उन्हें प्रमोद पाहन के नाम से भी जाना जाता है।

हॉकी को लेकर बचपन से ही जयपाल सिंह मुंडा में लगाव था। अपनी प्रतिभा और क्षमता के दम पर वह भारतीय हॉकी टीम के सदस्य बने। वह डिफेंडर के तौर पर खेलते थे। 1928 में एम्सटर्डम में खेले गए ओलंपिक में वह भारतीय टीम के कप्तान थे। उनकी कप्तानी में भारतीय टीम ने 17 लीग स्टेज मैचों में 16 में जीत हासिल की थी, जबकि एक मैच ड्रॉ रहा था। इंग्लिश टीम मैनेजर ए. बी. रॉसर के साथ विवाद की वजह से वह नॉकआउट मैचों में नहीं खेले थे। फाइनल में भारत ने हालैंड को हराकर स्वर्ण पदक जीता था।

1929 में उन्होंने अपनी टीम बनाई और अलग-अलग प्रतियोगिताओं में उसका नेतृत्व किया।

अर्थशास्त्र में स्नातक की डिग्री लेने वाले जयपाल सिंह मुंडा भारतीय सिविल सेवा के लिए भी चुने गए थे, लेकिन बाद में उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया था। 1934 में वे घाना के गोल्ड कोस्ट के अचिमोटा में प्रिंस ऑफ वेल्स कॉलेज में टीचर बन गए। 1937 में, वे रायपुर के राजकुमार कॉलेज के प्रिंसिपल के तौर पर भारत लौट आए। 1938 में, वे विदेश सचिव के तौर पर बीकानेर रियासत में शामिल हो गए। 1938 के आखिरी महीने में, मुंडा ने पटना और रांची का दौरा किया था। वहां उन्होंने आदिवासी लोगों की खराब हालत देखते हुए राजनीति में आने का फैसला किया।

सक्रिय राजनीति में आने के बाद जयपाल सिंह मुंडा आदिवासियों के हितों और मध्य भारत में उनके लिए एक अलग देश बनाने के लिए एक कैंपेनर के रूप में उभरे। उन्होंने पूरे आदिवासी समुदाय के अधिकारों की वकालत की।

मुंडा 1939 में आदिवासी महासभा के अध्यक्ष बने। 1946 में, वे भारत की संविधान सभा के लिए चुने गए, जो भारत के संविधान का ड्राफ्ट बनाने के लिए बनी थी। छोटानागपुर के आदिवासी उन्हें "मरांग गोमके" (संथाली में महान नेता) के नाम से जानते हैं।

भारत की आजादी के बाद उनकी आदिवासी महासभा 1949-50 में झारखंड पार्टी के तौर पर फिर से उभरी। उन्होंने झारखंड पार्टी के उम्मीदवार के रूप में रांची (पश्चिम) से स्वतंत्र भारत का पहला आम चुनाव लड़ा और जीत हासिल की।

​​1952 के बिहार विधानसभा चुनाव में, झारखंड पार्टी राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी बनी। 1955 में, पार्टी ने राज्य पुनर्गठन आयोग को एक ज्ञापन सौंपा, जिसमें दक्षिण बिहार के आदिवासी क्षेत्रों को मिलाकर एक अलग झारखंड राज्य के निर्माण की वकालत की गई। क्षेत्र की भाषाई विविधता, एक आम संपर्क भाषा की अनुपस्थिति, आदिवासी आबादी की अल्पसंख्यक स्थिति और इस तरह के अलगाव के आर्थिक प्रभावों के बारे में चिंताओं के कारण प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया गया।

झारखंड पार्टी का प्रभाव बाद में लगातार कम होता गया और 1963 में पार्टी का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विलय हो गया। 1963 में वह कांग्रेस पार्टी की टिकट पर ही लोकसभा के लिए चुने गए और 1970 में अपनी मृत्यु तक संसद सदस्य रहे। आदिवासियों और अलग झारखंड राज्य की लड़ाई लड़ने वाले जयपाल सिंह मुंडा का निधन 20 मार्च 1970 को 67 साल की आयु में नई दिल्ली में हो गया।

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