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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · रात 2:36 · नई दिल्ली संस्करण

शीत युद्ध, शेख अब्दुल्ला और अमेरिका: जानिए 7 दशक पहले कैसा था कश्मीर का भू-राजनीतिक खेल

राष्ट्रीय सागर डेस्क3 मिनट का पठन
शीत युद्ध, शेख अब्दुल्ला और अमेरिका: जानिए 7 दशक पहले कैसा था कश्मीर का भू-राजनीतिक खेल

आज भले ही अमेरिका कश्मीर को भारत का अंदरूनी मामला बताता हैं, लेकिन लगभग सात दशक पहले हालात जुदा थे। 1950 के दशक की शुरुआत में, कश्मीर अमेरिका के लिए सिर्फ भारत और पाकिस्तान के बीच का विवाद नहीं था। शीत युद्ध के दौरान, अमेरिका मध्य और दक्षिण एशिया के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्र मानता था। हाल ही में सामने आए अमेरिकी दस्तावेजों और खुफिया रिपोर्टों से इसका खुलासा होता है कि कैसे अमेरिका की कश्मीर में गहरी दिलचस्पी थी, और इसकी भौगोलिक स्थिति तथा कई देशों से लगी सीमाओं के कारण यह इलाका वाशिंगटन की नजर में क्यों महत्वपूर्ण था।

1951 की अमेरिकी खुफिया रिपोर्टें वहां के अधिकारियों, जैसे फ्रैंक कॉलिन्स, हॉवर्ड मेयर्स और मिस्टर मैफेट के बीच हुई कश्मीर को लेकर बातचीत का ब्यौरा देती हैं। इन रिपोर्टों में कॉलिन्स और मैफेट को पाकिस्तान और ब्रिटेन की ओर झुकाव रखने वाला और भारत का आलोचक बताया गया है, जबकि हॉवर्ड मेयर्स को एक अधिक संतुलित अधिकारी के रूप में दिखाया गया है। जनवरी 1951 के गोपनीय अमेरिकी ज्ञापन में कश्मीर विवाद पर ब्रिटेन और अमेरिका की रणनीति पर चर्चा हुई, जिसमें अमेरिका ने ब्रिटेन से पहल करने का आग्रह किया था।

इन दस्तावेजों में भारत के नियंत्रण वाले कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस की गतिविधियों और प्रस्तावित संविधान सभा को लेकर चिंता जाहिर की गई थी, जिसके प्रस्ताव को अक्टूबर 1950 में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने पारित किया था और पाकिस्तान ने इसका विरोध किया था। दस्तावेजों में जनमत संग्रह का जिक्र है। अमेरिकी अधिकारियों का मानना था कि यदि अमेरिका और ब्रिटेन पाकिस्तान पर सैनिकों, नागरिकों और कबायली लड़ाकों को वापस बुलाने का दबाव डालें और आजाद कश्मीर फोर्स को खत्म किया जाए, तब जनमत संग्रह संभव हो सकता है। दूसरी ओर, भारत का तर्क था कि पाकिस्तान की सेना और घुसपैठियों की वापसी पहले होनी चाहिए। यह मूल मतभेद ही इस मुद्दे को सुलझने नहीं दे रहा था।

खुफिया दस्तावेज शेख अब्दुल्ला और तत्कालीन अमेरिकी राजदूत लॉय हेंडरसन की बातचीत का उल्लेख करते हैं। अब्दुल्ला ने आजाद कश्मीर (स्वतंत्र कश्मीर) देखने की इच्छा व्यक्त कर कहा कि कई कश्मीरी भी ऐसा चाहते थे। उनका मानना था कि एक स्वतंत्र कश्मीर के लिए भारत और पाकिस्तान दोनों के साथ अच्छे रिश्ते आवश्यक है। अब्दुल्ला ने पाकिस्तान के धार्मिक शासन को कश्मीर के लिए नुकसानदेह बताया और भारत के साथ जाना बेहतर माना, साथ ही कश्मीर के बंटवारे को भी अव्यावहारिक बताया।

तब शेख अब्दुल्ला के सहयोगी रहे बख्शी गुलाम मोहम्मद भी पूरे घटनाक्रम में अहम भूमिका निभा रहे थे। वह दिल्ली के संपर्क में रहते थे और घाटी की गतिविधियों की जानकारी प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को देते थे। 1953 में अब्दुल्ला को पद से हटाकर गिरफ्तार किया गया और उन पर विदेशी ताकत से मिलीभगत के आरोप लगे, हालांकि तब नेहरू ने अमेरिकी साजिश की बात खारिज कर दी थी। फरवरी 1954 में, बख्शी के नेतृत्व वाली कश्मीर विधानसभा ने भारत में विलय के पक्ष में फैसला किया। इसके बाद नेहरू ने घोषणा की कि चूंकि निर्वाचित प्रतिनिधियों की राय सामने आ चुकी है, इसलिए जनमत संग्रह की अब कोई आवश्यकता नहीं है।

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