Garuda Purana: क्यों नहीं किया जाता छोटे बच्चों का दाह संस्कार? जानिए पौराणिक कारण
गरुड़ पुराण के अनुसार, 5 साल से कम उम्र के बच्चों का दाह संस्कार नहीं किया जाता। इसका कारण यह है कि बच्चा निष्पाप और सांसारिक मोह-माया से मुक्त होता है। उसका कोई कर्म-बही नहीं बनता, इसलिए उसकी आत्मा को शुद्धि के लिए अग्नि की जरूरत नहीं होती। छोटे बच्चों के शरीर को कच्ची मिट्टी जैसा माना जाता है, इसलिए उसे जल-समाधि या भू-समाधि दी जाती है, ताकि वह सीधे पंचतत्व में विलीन हो जाए।

हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद 16 संस्कारों में अंतिम संस्कार सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। लेकिन आपने देखा होगा कि छोटे बच्चों की मृत्यु होने पर उनका दाह संस्कार नहीं किया जाता, बल्कि उन्हें दफनाया जाता है या जल में समाधि दी जाती है। इसके पीछे क्या कारण है, इसका रहस्य गरुड़ पुराण में विस्तार से बताया गया है। गरुड़ पुराण के अनुसार, दाह संस्कार का मुख्य उद्देश्य आत्मा को मोक्ष की ओर ले जाना और पंचतत्व के शरीर को पंचतत्व में विलीन करना होता है। साथ ही पिंडदान और मंत्रों द्वारा आत्मा को उसके पापों और मोह-माया से मुक्त किया जाता है।
गरुड़ पुराण कहता है कि 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चे को 'बालक' कहा गया है, जो निष्पाप होता है। उसने अभी तक सांसारिक सुख-दुख, मोह-माया, लोभ, अहंकार जैसे बंधनों को नहीं जाना होता। उसका कोई कर्म-बही नहीं बनता। इसलिए उसकी आत्मा को शुद्धिकरण के लिए अग्नि की आवश्यकता नहीं होती। वह सीधे तौर पर अगले जन्म की ओर या परमात्मा में लीन हो जाती है। दाह संस्कार के मंत्रों का उद्देश्य आत्मा का अपने शरीर और परिवार से मोह भंग कराना होता है। छोटे बच्चे में यह मोह होता ही नहीं। वह सांसारिक बंधनों से पहले ही मुक्त होता है, इसलिए उसके लिए अग्नि संस्कार की विधि जरूरी नहीं मानी गई।
शास्त्रों में कहा गया है कि छोटे बच्चों का शरीर कच्ची मिट्टी के घड़े जैसा होता है, जो अभी पूरी तरह से कठोर नहीं हुआ है। इसलिए उसे अग्नि में पकाने की जरूरत नहीं। उसे जल में प्रवाहित करने या भूमि में दफनाने से ही वह प्रकृति के पांच तत्वों में विलीन हो जाता है। इसे 'भू-समाधि' या 'जल-समाधि' कहा जाता है। कुछ ग्रंथों में 2.5 साल से कम उम्र के बच्चों को संत के समान माना गया है। जैसे संतों और महात्माओं को दफनाया जाता है, वैसे ही छोटे बच्चों को भी दफनाया जाता है क्योंकि दोनों ही मोह-माया से परे होते हैं।
व्यावहारिक रूप से भी देखा जाए तो छोटे बच्चों की हड्डियां बहुत कोमल होती हैं, जिनमें अग्नि संस्कार के बाद अस्थियां (फूल) चुनना मुश्किल होता है। इसलिए जल समाधि या भू-समाधि को ज्यादा उचित माना गया है। हालांकि, यह नियम हर जगह एक जैसा नहीं है। कई जगह 5 साल तक तो कई जगह जनेऊ संस्कार (12 साल) से पहले तक के बच्चों के लिए यह परंपरा निभाई जाती है। इसका मुख्य उद्देश्य उस निष्पाप आत्मा को सम्मान देना और उसे प्रकृति की गोद में शांतिपूर्वक वापस भेजना है।




