हिंदुत्व से लेकर युवाओं तक, वापसी की राह तलाश रही शिवसेना (यूबीटी)

मुंबई। शिवसेना के एकनाथ शिंदे गुट में शामिल हुए छह लोकसभा सांसदों के हाई-प्रोफाइल दलबदल के बाद संकट का सामना कर रही शिवसेना (यूबीटी) को बचाने के लिए पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे ने तीनस्तरीय रणनीति अपनाई है। इसमें पार्टी की विचारधारा को मजबूत करना, मुद्दों के आधार पर युवाओं को जोड़ना और संवैधानिक व कानूनी लड़ाई लड़ना शामिल है।
पार्टी के प्रमुख नेताओं के चले जाने के बाद शिवसेना (यूबीटी) राजनीतिक माहौल को सत्तारूढ़ भाजपा के नेतृत्व वाले महायुति/एनडीए गठबंधन के खिलाफ मोड़ने की कोशिश कर रही है।
ठाकरे ने पूरे राज्य में "राम रक्षा" अभियान और भाजपा मुक्त राम आंदोलन शुरू कर श्री राम मंदिर चढ़ावे में वित्तीय अनियमितताओं का मुद्दा उठाया है।
यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि पारंपरिक रूप से हिंदुत्व ही भाजपा का प्रमुख वैचारिक आधार रहा है।
राम मंदिर आंदोलन से जुड़े वित्तीय मामलों पर सवाल उठाकर और चंदे (खासकर चांदी की ईंटों) का हिसाब मांगकर ठाकरे ने भाजपा के मुख्य वोट बैंक को निशाना बनाया है।
इससे भाजपा अपने ही गढ़ में बचाव की स्थिति में आ गई है।
नागपुर में भाजपा को उसकी वैचारिक जमीन पर चुनौती देने का उद्देश्य शिवसेना (यूबीटी) के पारंपरिक वोटरों को यह संदेश देना है कि राजनीतिक परिस्थितियां बदलने के बावजूद पार्टी ने अपनी मूल विचारधारा को नहीं छोड़ा है।
जंतर-मंतर जाना, नीट पेपर लीक के विरोध में प्रदर्शन कर रहे लोगों पर पुलिस की लाठीचार्ज की निंदा करना, सरकार की तुलना औपनिवेशिक शासकों से करना और मुफ्त कानूनी सहायता केंद्र शुरू करना—इन कदमों के जरिए ठाकरे ने कुछ समय के लिए अपनी रणनीति में बदलाव किया है।
वे युवा, शहरी और मध्यम वर्ग के वोटरों के बीच अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए शिवसेना (यूबीटी) की पारंपरिक क्षेत्रीय, राष्ट्रवादी और धार्मिक राजनीति से अलग तरीके अपना रहे हैं।
छात्रों के विरोध-प्रदर्शन में शामिल होकर उद्धव ठाकरे ने शिक्षा व्यवस्था, परीक्षाओं की निष्पक्षता और राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए।
औपनिवेशिक शासन और इंदिरा गांधी व मनमोहन सिंह के दौर से तुलना करने का उद्देश्य मौजूदा सत्ताधारी गठबंधन को कठघरे में खड़ा करना था। इसके जरिए वे प्रशासनिक कमियों से प्रभावित तटस्थ और युवा मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 22 जुलाई को अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया था, लेकिन स्पीकर, सचिवालय और बागी सांसदों के खिलाफ कारण बताओ नोटिस मिलने से शिंदे गुट पर कानूनी तलवार लटकी हुई है। कानूनी तौर पर यह दल-बदल विरोधी कानून के तहत 'विभाजन' बनाम 'विलय' के प्रावधानों की सीमाओं की परीक्षा है, खासकर तब जब मूल पार्टी अपनी स्वतंत्र कानूनी पहचान बनाए रखती है।
राजनीतिक रूप से इस कदम के जरिए बागी सांसदों को ऐसे अवसरवादी नेताओं के रूप में पेश किया गया, जिन्होंने उस जनादेश के साथ विश्वासघात किया जिसके आधार पर वे चुने गए थे। ऐतिहासिक रूप से उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के बीच हुए विभाजन ने मुंबई-ठाणे-कोंकण क्षेत्र में शिवसेना के पारंपरिक वोट बैंक को बांट दिया।
राज ठाकरे के साथ दोबारा जुड़ने से एक मजबूत क्षेत्रीय गठबंधन बनता है।
इससे आने वाले नगर निकाय (बीएमसी) और राज्य स्तरीय चुनावों में मराठी वोटों को एकजुट करने में मदद मिल सकती है। साथ ही ऐसा संयुक्त मोर्चा तैयार हो सकता है जिसे राष्ट्रीय पार्टियों के लिए कमजोर करना आसान नहीं होगा।
हालांकि ठाकरे के आक्रामक रुख से पार्टी में कुछ समय के लिए ऊर्जा आई है, लेकिन अभी भी कई चुनौतियां बनी हुई हैं।
चुने हुए सांसदों और विधायकों के लगातार दल बदलने से जमीनी स्तर पर पार्टी संगठन कमजोर होता है, भले ही जनता की सहानुभूति शिवसेना (यूबीटी) गुट के साथ हो।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि राम मंदिर अभियान के जरिए कट्टर हिंदुत्व का संदेश देने के साथ-साथ व्यापक सामाजिक और युवा मुद्दों पर भी ध्यान देना होगा।
इसके अलावा, गठबंधन की राजनीति में संतुलन बनाए रखना जरूरी है, ताकि पारंपरिक राष्ट्रवादी या धर्मनिरपेक्ष सहयोगी नाराज न हों।
सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक मामलों की सुनवाई अक्सर लंबे समय तक चलती है। अगर समय पर कानूनी रोक नहीं लगाई जाती है, तो जमीनी स्तर पर बनी राजनीतिक स्थिति (जैसे मान्यता प्राप्त विलय) को बड़े चुनावों से पहले बदलना मुश्किल हो सकता है।
ठाकरे के हालिया कदमों से संकेत मिलता है कि उनकी पार्टी खुद को क्षेत्रीय राजनीति में कमजोर या हाशिए पर जाने देने के लिए तैयार नहीं है। वैचारिक विरोध, कानूनी चुनौतियों, युवाओं को जोड़ने और क्षेत्रीय एकता की रणनीति के जरिए वह इस राजनीतिक संघर्ष को केंद्र सरकार के खिलाफ लोकतांत्रिक जवाबदेही और स्थानीय पहचान की लड़ाई के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं।





