Uttar Pradesh: नगीना पर भड़कीं मायावती, साजिश बताया तो भड़क गए चंद्रशेखर - दिया करारा जवाब!

बसपा सुप्रीमो मायावती के उस बयान के बाद सियासत गरमा गई है जिसमें उन्होंने नगीना से चंद्रशेखर आजाद की जीत को एक सोची-समझी साजिश बताया था। अब इस पर आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के प्रमुख और नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद ने पलटवार किया है। चंद्रशेखर ने कहा है कि नगीना की जनता के जनादेश को साजिश से जोड़कर अपमानित न किया जाए। दरअसल, हाल ही में लखनऊ में बसपा की एक बैठक में मायावती ने कहा था कि दलित वोटों को बांटने और बसपा को कमजोर करने के लिए विरोधी पार्टियों ने साजिश के तहत नए-नए दलित चेहरों को आगे किया है। उनका इशारा सीधे तौर पर चंद्रशेखर आजाद की तरफ था।
मायावती ने कहा था कि नगीना में जो हुआ वो भाजपा और अन्य दलों की मिली-जुली रणनीति थी ताकि बसपा का वोट बैंक टूट जाए। इस पर शुक्रवार को चंद्रशेखर आजाद ने सहारनपुर में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जवाब दिया। उन्होंने कहा, "बहन जी मेरी बड़ी हैं, मैं उनका सम्मान करता हूं। लेकिन नगीना की जनता ने मुझे साजिश से नहीं, बल्कि उम्मीद से चुना है। 5 साल तक जो लोग नगीना की गलियों में नहीं आए, जिन्होंने यहां के दलित, मुस्लिम, पिछड़े वर्ग के दर्द को नहीं समझा, जनता ने उन्हें नकार दिया।" चंद्रशेखर ने आगे कहा, "मैंने नगीना की धरती पर 10 साल संघर्ष किया है। जब हाथरस की बेटी के साथ अन्याय हुआ तो मैं ही रात में पहुंचा था। जब CAA-NRC के खिलाफ लोग सड़क पर थे तो जेल में मैं था। ये साजिश नहीं, ये संघर्ष की जीत है।
बहन जी को सोचना चाहिए कि आज दलित युवा बसपा से क्यों दूर जा रहा है।"उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि नगीना लोकसभा सीट पर उन्होंने 1.5 लाख से ज्यादा वोटों से जीत हासिल की, जिसमें दलितों के साथ-साथ मुस्लिम, गुर्जर और अन्य पिछड़े वर्ग का भी भरपूर समर्थन मिला। यह जीत सिर्फ दलितों की नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की जीत है। चंद्रशेखर ने यह भी कहा कि वह आज भी कांशीराम साहब के मिशन को मानते हैं और मायावती जी को अपनी विरोधी नहीं मानते। उन्होंने कहा, "मैं चाहता हूं कि बहन जी हम जैसे युवाओं को आशीर्वाद दें, न कि साजिश का हिस्सा बताएं। अगर हम लड़ेंगे तो फायदा भाजपा को ही होगा। मेरा मकसद भाजपा को हराना है, बसपा को नहीं।"
वहीं इस पूरे विवाद पर बसपा की तरफ से भी प्रतिक्रिया आई है। बसपा के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि चंद्रशेखर को जीत का घमंड हो गया है। बसपा का कैडर आज भी सबसे मजबूत है और एक सीट की जीत से आंदोलन नहीं बनता। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह लड़ाई सिर्फ दो नेताओं की नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश में दलित नेतृत्व की लड़ाई है। मायावती पिछले 30 साल से दलितों की सबसे बड़ी नेता रही हैं, लेकिन पिछले दो लोकसभा चुनावों से बसपा का वोट प्रतिशत लगातार गिर रहा है। वहीं चंद्रशेखर आजाद एक नए विकल्प के रूप में उभर रहे हैं, खासकर युवाओं में उनकी पकड़ मजबूत है। फिलहाल चंद्रशेखर के इस बयान के बाद साफ हो गया है कि वह झुकने वाले नहीं हैं और 2027 के विधानसभा चुनाव में वह खुद को दलित-मुस्लिम गठजोड़ के बड़े नेता के तौर पर पेश करने की तैयारी में हैं।
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