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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · सुबह 4:47 · नई दिल्ली संस्करण

उपेक्षा की मार झेल रही मल्ल राजाओं की स्मृति से जुड़ी "टेराकोटा"

राष्ट्रीय सागर डेस्क3 मिनट का पठन
उपेक्षा की मार झेल रही मल्ल राजाओं की स्मृति से जुड़ी "टेराकोटा"

बांकुड़ा।बांकुड़ा जिले के विष्णुपुर का नाम आते ही राढ़ बंगाल की लाल मिट्टी पर खड़ी अद्वितीय स्थापत्य कला और मल्ल राजाओं की अमर धरोहर टेराकोटा मंदिरों की छवि सामने उभर आती है। लैटिन शब्द ‘टेरा’ अर्थात मिट्टी और ‘कोटा’ अर्थात पकाना— इन दोनों के मेल से बनी टेराकोटा कला बंगाल की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।विष्णुपुर के मंदिरों की दीवारों पर बनी टेराकोटा नक्काशी में पुराणों की कथाएं, ऐतिहासिक युद्ध, राजसी जीवन, नौकाविहार, विभिन्न पशु-पक्षी तथा तत्कालीन सामाजिक जीवन की झलक दिखाई देती है। स्थापत्य शैली के आधार पर इन मंदिरों को मुख्य रूप से चार श्रेणियों— चाल, रत्न, दालान और देउल— में विभाजित किया जाता है।इतिहास में मल्लराजाओं द्वारा निर्मित रासमंच, श्यामराय मंदिर, जोड़बांग्ला मंदिर और मदनमोहन मंदिर विश्वभर में प्रसिद्ध हैं। हालांकि इनके अलावा भी विष्णुपुर में कई ऐसे प्राचीन मंदिर और स्थापत्य मौजूद हैं, जो आज प्रचार और संरक्षण के अभाव में धीरे-धीरे नष्ट होते जा रहे हैं। कई स्थानों पर स्थापना संबंधी अभिलेख उपलब्ध नहीं होने के कारण उनका संपूर्ण इतिहास भी स्पष्ट रूप से सामने नहीं आ पाया है।इन्हीं प्राचीन धरोहरों में श्री श्री महाप्रभु जीउ मंदिर का नाम उल्लेखनीय है। माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण लगभग सोलहवीं शताब्दी में महाराज गोपाल सिंह ने कराया था। जोड़बांग्ला शैली में बने इस मंदिर की दीवारों पर कभी उत्कृष्ट टेराकोटा कला दिखाई देती थी, लेकिन समय के साथ इसका अधिकांश हिस्सा नष्ट हो चुका है।इसी प्रकार मृन्मयी मंदिर जाने वाले मार्ग पर स्थित युगोल किशोर कृष्ण-बलराम मंदिर भी ऐतिहासिक महत्व रखता है। ओड़िशा की देउल शैली से प्रभावित इन मंदिरों का निर्माण अनुमानतः अठारहवीं शताब्दी में हुआ था। आज भी इनके कुछ हिस्सों में प्राचीन टेराकोटा कला के अवशेष दिखाई देते हैं, लेकिन पूरा परिसर अब झाड़ियों और वनस्पतियों से घिर चुका है।मदनमोहन मंदिर के मार्ग पर स्थित एक प्राचीन पंचरत्न शैली का मंदिर भी वर्तमान में उपेक्षा का शिकार है। मंदिर के अधिकांश शिखर टूट चुके हैं और परिसर का बड़ा भाग पेड़-पौधों से ढंका हुआ है। मंदिर में अब कोई प्रतिमा भी मौजूद नहीं है।विष्णुपुर के इतिहास का एक चर्चित और भावनात्मक अध्याय लालबाई महल तथा लालबांध से जुड़ा हुआ है। ऐतिहासिक कथाओं के अनुसार, ओड़िशा के पठान सरदार रहीम खान की संपत्ति पर अधिकार करने के दौरान मल्लराज द्वितीय रघुनाथ सिंह ललबाई को विष्णुपुर लेकर आए थे। बाद में राजा ने उनके लिए नया महल बनवाया, जिसे लालबाई महल कहा गया।लोककथाओं के अनुसार, इस संबंध को लेकर राजपरिवार में विवाद बढ़ा और अंततः ललबाई की मृत्यु लालबांध में हुई। आज लालबाई महल केवल एक जर्जर अवशेष के रूप में मौजूद है, जो अतीत की कहानी सुनाता है।इतिहास प्रेमियों और विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विष्णुपुर की इन उपेक्षित ऐतिहासिक धरोहरों का जल्द संरक्षण और पुनरुद्धार नहीं किया गया, तो बंगाल की टेराकोटा विरासत का एक महत्वपूर्ण अध्याय हमेशा के लिए समाप्त हो सकता है।

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