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महिला-केंद्रित कहानियों के मास्टर बिमल रॉय, स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखकर बनाते थे फिल्म

राष्ट्रीय सागर डेस्क3 मिनट का पठन
महिला-केंद्रित कहानियों के मास्टर बिमल रॉय, स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखकर बनाते थे फिल्म

मुंबई। भारतीय सिनेमा की दुनिया में बिमल रॉय ऐसे निर्देशक थे, जिनकी फिल्मों में मनोरंजन के साथ-साथ समाज की सच्चाई, आम आदमी की पीड़ा और महिलाओं की दुनिया की झलक दिखाई देती थी। उनकी अधिकतर फिल्मों में अक्सर महिला पात्र अहम होती थीं। उनका संघर्ष, उनका साहस और उनकी संवेदनाएं फिल्म के भाव को आगे बढ़ाती थीं।

यह सिर्फ पटकथा की ताकत नहीं, बल्कि बिमल रॉय की संवेदनशील नजर और समाज को दिखाने का तरीका था।

बिमल रॉय का जन्म 12 जुलाई 1909 को एक जमींदार परिवार में हुआ। पिता की मृत्यु के बाद उन्हें पारिवारिक कलह और कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उन्हें जमींदारी से बेदखल कर दिया गया। यह अनुभव उनके मन में समाज की अन्यायपूर्ण व्यवस्थाओं और कमजोर लोगों के दर्द को महसूस करने की क्षमता लेकर आया।

उन्होंने कोलकाता जाकर न्यू थिएटर्स में कैमरा असिस्टेंट के रूप में काम शुरू किया। वहीं उन्होंने अपनी पहली बड़ी फिल्म 'देवदास' (1935) में प्रचार फोटोग्राफर के रूप में योगदान दिया।

1940 और 1950 के दशक में बिमल रॉय समानांतर सिनेमा का अहम हिस्सा बन गए।

उनके करियर का दूसरा बड़ा चरण तब शुरू हुआ, जब उन्होंने मुंबई में अपनी टीम के साथ काम किया। उनकी पहली महिला-केंद्रित फिल्में जैसे 'दो बीघा जमीन' (1953) और 'परिणीता' (1953) ने दर्शकों और समीक्षकों दोनों का ध्यान खींचा। 'दो बीघा जमीन' में निरुपा रॉय के किरदार के जरिए आम किसान की पीड़ा दिखाई, और 'परिणीता' में मीना कुमारी की भूमिका ने महिला संघर्ष और भावनाओं को खूबसूरती से पेश किया।

बिमल रॉय की फिल्मों में महिलाओं को सिर्फ साइड रोल या सहायक पात्र के रूप में नहीं दिखाया गया।

'बिराज बहू' (1954) में मुख्य पात्र बिराज (कामिनी कौशल), जिसका नीलंबर चक्रवर्ती (अभि भट्टाचार्य) से बचपन में ही विवाह हो गया था, इसमें कैसे बिराज अपने परिवार के भीतर और समाज के दबावों के बीच मजबूती और संयम के साथ संघर्ष करती है, दिखाया गया। इसी तरह 'सुजाता' (1959) में सामाजिक भेदभाव और स्त्री स्वतंत्रता को दिखाया गया। इन फिल्मों में महिला पात्रों की भावनाओं, उनकी मुश्किलों और साहस को बड़े सम्मान के साथ दिखाया गया।

उनकी सबसे मशहूर फिल्म 'मधुमती' (1958) भी महिला पात्र के इर्द-गिर्द घूमती है। फिल्म में वैजयन्ती माला मुख्य भूमिका में थीं। इस फिल्म में उनके किरदार की यादें, प्यार और संघर्ष को शानदार तरीके से दिखाया गया। इसी तरह 'बंदिनी' (1963) में कैदी महिला पात्र की मानसिक और भावनात्मक यात्रा को दर्शकों तक पहुंचाया गया।

बिमल रॉय ने अपने करियर में 11 फिल्मफेयर पुरस्कार और कई राष्ट्रीय पुरस्कार जीते।

उनकी फिल्मों में संगीत, संवाद और अभिनय का तालमेल समाज और भावनाओं को मजबूती से दिखाता था। 'परख,' 'यहूदी,' 'प्रेम पत्र,' 'मां,' 'अंजनगढ़,' 'नौकरी,' और उनकी कई अन्य फिल्में व्यावसायिक रूप से सफल रहीं और महिला-केंद्रित कहानी भी बनी।

बिमल रॉय का निधन 7 जनवरी 1966 को हुआ, लेकिन उनके काम और फिल्में आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं। यही वजह है कि उन्हें आज भी 'साइलेंट डायरेक्टर ऑफ इंडियन सिनेमा' कहा जाता है।

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