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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · सुबह 6:25 · नई दिल्ली संस्करण

आतिशी ने दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष पर विपक्ष को चुप कराने का आरोप लगाया

राष्ट्रीय सागर डेस्क2 मिनट का पठन
आतिशी ने दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष पर विपक्ष को चुप कराने का आरोप लगाया

नई दिल्ली। दिल्ली विधानसभा में विपक्ष की नेता आतिशी ने मंगलवार को अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता को पत्र लिखकर उन पर बार-बार निलंबन और निष्कासन के जरिए विपक्ष को 'चुप कराने' का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि आम आदमी पार्टी के विधायक सदन की कार्यवाही में तभी भाग लेंगे जब चार विधायकों का निलंबन रद्द किया जाएगा।

अपने पत्र में आतिशी ने विपक्ष की अनुपस्थिति पर सवाल उठाने और इसे लोकतांत्रिक जिम्मेदारी का उल्लंघन बताने वाले अध्यक्ष के हालिया बयानों को 'गलत और बेहद हास्यास्पद' बताया।

उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले एक साल में दिल्ली विधानसभा ने एक लोकतांत्रिक संस्था के रूप में काम नहीं किया है और दावा किया कि विपक्ष की आवाज को व्यवस्थित रूप से दबाया गया है।

निर्वाचित प्रतिनिधियों को 'मामूली सी बात पर' निलंबित या सदन से बाहर निकाल दिया गया है। इस तानाशाही रवैये का सबसे स्पष्ट उदाहरण शीतकालीन सत्र के दौरान देखने को मिला। इस दौरान उन्होंने आम आदमी पार्टी के चार विधायकों संजीव झा, कुलदीप कुमार, जरनैल सिंह और सोम दत्त के निलंबन का जिक्र किया।

उन्होंने लिखा कि इन चारों विधायकों को न केवल विधानसभा की कार्यवाही में भाग लेने से रोका गया, बल्कि उन्हें परिसर में प्रवेश करने से भी मना किया गया और सत्र समाप्त होने के बाद भी उन्हें समिति की बैठकों से बाहर रखा गया। यह अनुशासन नहीं है, यह असहमति को कुचलने के उद्देश्य से दी गई सजा है।

आतिशी ने आगे स्पष्ट दोहरे मापदंड का आरोप लगाते हुए दावा किया कि भाजपा विधायकों ने दो दिनों तक कार्यवाही बाधित की, लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई।

कोई निलंबन नहीं। कोई जवाबदेही नहीं। दिल्ली विधानसभा के इतिहास में ऐसा पक्षपातपूर्ण व्यवहार कभी नहीं देखा गया।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विपक्ष मौजूदा बजट सत्र में भाग लेने के लिए उत्सुक है, क्योंकि उनके फैसले राष्ट्रीय राजधानी के भविष्य को आकार देंगे। उन्होंने 21 मार्च को आम आदमी पार्टी के विधायकों के प्रतिनिधिमंडल और अध्यक्ष के बीच हुई बैठक का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने रचनात्मक बातचीत करने की इच्छा व्यक्त की थी।

हालांकि, उन्होंने कहा कि डर, बहिष्कार और चुनिंदा दंड के माहौल में सार्थक भागीदारी संभव नहीं है।

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