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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · रात 2:34 · नई दिल्ली संस्करण

'होर्मुज तोड़ू' प्लान: पश्चिमी देश खुश, पर भारतीय नौसेना और अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती

राष्ट्रीय सागर डेस्क2 मिनट का पठन
'होर्मुज तोड़ू' प्लान: पश्चिमी देश खुश, पर भारतीय नौसेना और अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती

ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक स्तर पर होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति में बाधाओं की आशंका हमेशा बनी रहती है। यह स्थिति कई देशों के लिए चिंता का विषय है, जहाँ तेल की कमी से जनता परेशान हो सकती है और सरकारें वैकल्पिक समाधान तलाशने में जुटी हैं। ऐसे में, पश्चिमी एशिया के एक देश सीरिया ने एक महत्वाकांक्षी योजना प्रस्तुत की है, जिसे ‘होर्मुज तोड़ू’ प्लान कहा जा रहा है। इस योजना में समुद्र और सड़क दोनों मार्गों का उपयोग करके एक नया तेल मार्ग बनाने का प्रस्ताव है।

हालाँकि, अमेरिका जैसे कुछ देश इस पहल से खुश हैं, लेकिन भारत के लिए यह रूट किसी भी तरह से फायदेमंद नहीं है और इसमें कई व्यावहारिक खामियाँ हैं। सीरिया द्वारा प्रस्तावित यह योजना इराक के बसरा शहर से लेकर सीरिया के बनियास बंदरगाह तक लगभग 1,600 किलोमीटर लंबी एक विशाल तेल पाइपलाइन बिछाने की है। इस परियोजना की अनुमानित लागत 5.7 बिलियन डॉलर (लगभग 48 हजार करोड़ रुपये) है। इस पाइपलाइन की क्षमता प्रतिदिन 20 लाख बैरल कच्चे तेल की आपूर्ति करने की होगी।

इस प्रस्ताव को देखकर कई पश्चिमी देशों ने इसे ‘शानदार’ बताया है और इसे होर्मुज जलडमरूमध्य का एक प्रभावी विकल्प माना जा रहा है। हालाँकि, जब इस पूरे प्लान का भारत के दृष्टिकोण से विश्लेषण किया गया, तो चौंकाने वाली सच्चाई सामने आई। जिसे दुनिया होर्मुज को अप्रभावी बनाने वाला एक ‘मास्टरप्लान’ समझ रही है, वह भारत के लिए पूरी तरह बेकार और निरर्थक साबित होता है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है। वर्तमान में, इराक से आने वाले तेल टैंकर फारस की खाड़ी से निकलते हैं, होर्मुज जलडमरूमध्य को पार करते हैं, और सीधे अरब सागर में प्रवेश करके कुछ ही दिनों में भारतीय बंदरगाहों तक पहुँच जाते हैं।

यह मार्ग सीधा, छोटा और आर्थिक रूप से अत्यधिक कुशल है। इसके विपरीत, यदि भारत सीरिया वाले नए रूट से तेल मंगाने का विचार करता है, तो तेल टैंकरों को पूरा का पूरा महाद्वीप घूमकर आना पड़ेगा। सीरिया के बनियास बंदरगाह से निकलने के बाद जहाजों को भूमध्य सागर पार करना होगा, फिर स्वेज नहर या जिब्राल्टर के पास से होते हुए लाल सागर और अंततः अरब सागर में प्रवेश करना होगा, जिसके बाद वे भारत पहुँचेंगे। इस लंबे समुद्री चक्कर की वजह से न सिर्फ जहाजों का ईंधन अत्यधिक खर्च होगा, बल्कि तेल पहुँचने में हफ्तों का अतिरिक्त समय भी लगेगा, जिससे लागत और समय दोनों में भारी वृद्धि होगी।

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