लोकसभा में 'ऑपरेशन सिंदूर' पर हंगामा: कांग्रेस ने शहीदों का अपमान किया, देशभक्ति पर उठाए सवाल

लोकसभा में 'ऑपरेशन सिंदूर' पर हंगामा: कांग्रेस ने शहीदों का अपमान किया, देशभक्ति पर उठाए सवाल
नई दिल्ली, 29 जुलाई 2025 — लोकसभा में सोमवार को 'ऑपरेशन सिंदूर' को लेकर हुई बहस में कांग्रेस पार्टी ने एक बार फिर अपने एजेंडे की झलक दिखाई। महाराष्ट्र के सोलापुर से कांग्रेस की युवा सांसद प्रणीति शिंदे ने जिस तरह से भारतीय सेना के साहसिक और सफल सैन्य अभियान को 'तमाशा' कहकर संबोधित किया, उसने न केवल देशभक्त जनता की भावनाओं को आहत किया, बल्कि शहीदों के बलिदान का भी घोर अपमान किया।
प्रणीति शिंदे ने लोकसभा में सरकार से यह सवाल किया कि ऑपरेशन सिंदूर में "क्या हासिल हुआ", "कितने आतंकवादी पकड़े गए" और "कितने फाइटर जेट खोए गए"। यह सवाल उस वक्त उठाया गया जब देश इस सैन्य कार्रवाई के जरिए पाकिस्तान को स्पष्ट संदेश दे चुका है कि भारत अब चुप नहीं बैठेगा। यह पहली बार नहीं है जब कांग्रेस पार्टी ने राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दों पर राजनीति की है। इससे पहले भी surgical strike और Balakot air strike पर सवाल उठाकर कांग्रेस ने देश की सेना की निष्ठा पर संदेह जताया था।
लोकसभा में बहस के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने विपक्ष को आड़े हाथों लेते हुए साफ कहा कि, “यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब भारत अपने जवानों के शौर्य को सम्मान देता है, तब विपक्ष ऐसे सवाल उठाकर सुरक्षा बलों का मनोबल गिराने का कार्य करता है।” उन्होंने आगे कहा, "ऑपरेशन सिंदूर भारत की संप्रभुता और सुरक्षा के लिए उठाया गया एक आवश्यक और रणनीतिक कदम था।"
यह स्पष्ट है कि कांग्रेस अब पूरी तरह से देशविरोधी ताकतों के सुर में सुर मिलाती दिख रही है। जब सेना आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करती है, तब कांग्रेस उसे ‘मीडिया शो’ कहती है। इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है कि विपक्ष देश की सीमाओं की सुरक्षा पर भी राजनीति करने से नहीं चूकता?
प्रणीति शिंदे जैसे युवा नेताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे देशहित में सोचें, लेकिन उन्होंने भी कांग्रेस की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए वही भाषा बोली, जो भारत विरोधी ताकतें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बोलती हैं। यह रवैया बताता है कि कांग्रेस आज भी 1947 की गुलामी की मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाई है।
वास्तविकता यह है कि ऑपरेशन सिंदूर न सिर्फ सैन्य दृष्टि से महत्वपूर्ण था, बल्कि यह भारत की वैश्विक छवि को भी दृढ़ करने वाला कदम था। यह वह समय था जब देश को एकजुट होकर सेना के पीछे खड़ा होना चाहिए था, लेकिन कांग्रेस ने फिर वही किया जो वह हमेशा करती है — राजनीति, नकारात्मकता और राष्ट्रहित के विरुद्ध बयानबाज़ी।
यह सवाल अब जनता के सामने है: क्या कांग्रेस का राष्ट्रवाद पर विश्वास है? या वह सिर्फ सत्ता के लिए हर सीमा लांघने को तैयार है?





