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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · सुबह 8:43 · नई दिल्ली संस्करण

आज आरबीआई रेपो रेट पर अहम फैसला, केंद्रीय बैंक के रुख और आगे की गाइडेंस पर नजर रहेगी

राष्ट्रीय सागर डेस्क2 मिनट का पठन
आज आरबीआई रेपो रेट पर अहम फैसला, केंद्रीय बैंक के रुख और आगे की गाइडेंस पर नजर रहेगी

नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी शुक्रवार को मुख्य पॉलिसी रेट को लेकर अपना फैसला सुनाने वाली है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि दिसंबर 2025 में ब्याज दर घटाने के बाद फरवरी में रिजर्व बैंक फिलहाल कोई बदलाव नहीं करेगा। हालांकि, बैंक आगे की नीति को लेकर क्या संकेत देता है, इस पर सभी की नजर रहेगी।

तीन दिन तक चलने वाली भारतीय रिजर्व बैंक की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी की बैठक बुधवार से शुरू हो चुकी है। डीबीएस बैंक की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और वरिष्ठ अर्थशास्त्री राधिका राव के अनुसार, मजबूत आर्थिक वृद्धि और अमेरिका के साथ व्यापार समझौते के बाद वैश्विक जोखिम कम होने से रिजर्व बैंक आने वाले समय को ध्यान में रखते हुए लचीली नीति अपना सकता है।

राव ने कहा, "महंगाई कम होने और रुपये पर दबाव बने रहने के बावजूद, डिपॉजिट जुटाने की चुनौतियों और पोर्टफोलियो आउटफ्लो के जोखिम को देखते हुए आगे रेट कट से बचा जा सकता है।

अनुमान है कि रिजर्व बैंक नकदी प्रबंधन, बॉन्ड बाजार को स्थिर रखने और मुद्रा प्रबंधन जैसे उपायों पर ज्यादा ध्यान देगा। इस तिमाही और अप्रैल से जून 2026 के दौरान सरकारी बॉन्ड की खरीद जारी रह सकती है।

उम्मीद है कि आरबीआई डायरेक्ट लिक्विडिटी, बॉन्ड स्थिरता और करेंसी मैनेजमेंट उपायों पर निर्भर रहेगा, जिसमें इस तिमाही और अप्रैल-जून 2026 में बॉन्ड खरीदारी जारी रहेगी।

अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, नीतिगत ब्याज दर में ढील के बावजूद हाल के समय में सरकारी बॉन्ड की यील्ड में लगातार तेजी देखने को मिली है।

इसी वजह से रिजर्व बैंक अपनी मौद्रिक नीति में यथास्थिति बनाए रख सकता है।

एसबीआई रिसर्च की एक रिपोर्ट में कहा गया है, "हमारा मानना ​​है कि पात्र सिक्योरिटीज का चुनाव ही ओएमओ ऑपरेशंस की प्रभावशीलता को प्रभावित कर सकता है, भले ही लिक्विडिटी इंजेक्शन की कुल मात्रा अपरिवर्तित रहे।" इसमें आगे कहा गया है, "इसलिए आरबीआई आगामी पॉलिसी में यथास्थिति बनाए रखेगा।

पिछली मौद्रिक नीति के बाद सबसे बड़ा बदलाव भारत और यूरोपीय संघ के साथ-साथ भारत और अमेरिका के बीच हुआ व्यापार समझौता है। इस समझौते के बाद भारत पर लगने वाला शुल्क 50 प्रतिशत से घटकर 18 प्रतिशत रह गया है।

एसबीआई रिसर्च के अनुसार, अब भारत एशियाई देशों में सबसे कम शुल्क वाले देशों में शामिल हो गया है। इससे भारतीय उत्पादों की वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और निर्यात को मजबूती मिलेगी।

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