डॉलर से दूरी बनाने को लेकर ब्रिक्स सम्मेलन में सारे देशों की बीच हुई ये चर्चा

ब्रिक्स सम्मेलन में डॉलर पर निर्भरता कम करने और स्थानीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ाने की चर्चा ने वैश्विक आर्थिक व्यवस्था को लेकर बहस छेड़ दी है। हालांकि, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के चीनी अध्ययन विशेषज्ञ प्रोफेसर के मुताबिक विकासशील देशों के लिए अचानक डॉलर से दूरी बनाना आसान नहीं होगा। इसकी वजह है कि वैश्विक कारोबार, ऊर्जा बाजार, बैंकिंग व्यवस्था और पश्चिमी देशों के बाजारों से इन अर्थव्यवस्थाओं के गहरे संबंध हैं। प्रोफेसर के मुताबिक दुनिया के करीब 54 फीसदी वैश्विक लेनदेन में अब भी डॉलर से होता है। ऐसे में अचानक डॉलर से हटने का असर विदेशी व्यापार से लेकर वित्तीय बाजारों तक पड़ सकता है।
भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश अभी भी अमेरिका और यूरोप के बाजारों पर काफी निर्भर हैं। इन देशों के लिए वैश्विक वित्तीय स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग व्यवस्था बेहद अहम है। यही कारण है कि ब्रिक्स के साझा दस्तावेज में डॉलर से सीधे दूरी बनाने की घोषणा नहीं की गई है। डॉलर के दबदबे की एक बड़ी वजह तेल कारोबार भी है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक प्रोफेसर ने 1972 में तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर की सऊदी अरब यात्रा और उसके बाद मजबूत हुए पेट्रोडॉलर ढांचे का उल्लेख किया। तेल के अंतरराष्ट्रीय कारोबार में डॉलर के इस्तेमाल ने अमेरिकी मुद्रा की वैश्विक मांग को मजबूत बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई।
आज भी तेल आयात करने वाले देशों को बड़े पैमाने पर डॉलर की जरूरत पड़ती है। इसलिए डॉलर से दूरी की कोशिश के बावजूद ऊर्जा कारोबार के कारण उसकी उपयोगिता बनी हुई है। ब्रिक्स के अंदर भी एक अलग आर्थिक गणित सामने आता है। प्रोफेसर के मुताबिक समूह के देशों के बीच करीब 1.7 ट्रिलियन डॉलर के आपसी कारोबार में करीब 47 फीसदी हिस्सेदारी चीनी युआन की है। ऐसे में डॉलर का विकल्प तलाशने के साथ यह सवाल भी अहम है कि नई व्यवस्था में किस मुद्रा की भूमिका बढ़ेगी। यदि डॉलर की जगह किसी एक दूसरी मुद्रा पर अत्यधिक निर्भरता बढ़ती है, तो उससे जुड़े नए आर्थिक जोखिम पैदा हो सकते हैं।
स्थानीय मुद्राओं में कारोबार और केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा को लेकर भी ब्रिक्स देशों में चर्चा हो रही है। डिजिटल मुद्रा के जरिए सदस्य देशों के बीच सीधे लेनदेन को बढ़ावा देने और अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था को ज्यादा लचीला बनाने की कोशिश की जा सकती है। हालांकि प्रोफेसर कोंडापल्ली इसे फिलहाल अंतरिम विकल्प मानते हैं। उनका कहना है कि डिजिटल मुद्राएं और स्थानीय करेंसी कारोबार डॉलर पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकते हैं, लेकिन मौजूदा वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में डॉलर की जगह पूरी तरह लेने की चुनौती अभी काफी बड़ी है।



