झारखंड हाई कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: बलात्कार के प्रयास और गरिमा भंग करने के अपराध में तय की सीमा

झारखंड हाई कोर्ट ने 26 साल पुराने एक मामले में कानूनी व्याख्या से जुड़ा एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि रात के समय किसी महिला के घर में घुसकर उसके कपड़े उठाने या खींचने की कोशिश को हर स्थिति में भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत 'बलात्कार का प्रयास' नहीं माना जा सकता। न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे कृत्य को महिला की गरिमा/लज्जा भंग करने (Section 354 IPC) और आपराधिक बल के प्रयोग के रूप में देखा जाना चाहिए।
यह मामला वर्ष 1998 का है, जिसमें पीड़िता ने आरोप लगाया था कि आरोपी रात के अंधेरे में उसके घर में घुसा और गलत नीयत से उसके कपड़े उठाने का प्रयास किया। वर्ष 2006 में घाटशिला की सत्र अदालत ने आरोपी को बलात्कार के प्रयास का दोषी ठहराते हुए 4 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। आरोपी ने इस फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील याचिका दायर की थी।
हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए कहा कि किसी अपराध की योजना बनाने या उसकी दिशा में कदम बढ़ाने का हर कार्य कानूनी रूप से उस अपराध का 'प्रयास' नहीं बन जाता। बलात्कार के प्रयास का आरोप साबित करने के लिए ऐसा विशिष्ट और प्रत्यक्ष कृत्य होना अनिवार्य है, जो सीधे तौर पर उस अपराध को अंजाम देने के अत्यंत निकट हो। केवल कपड़े खींचने या उठाने का प्रयास स्वतः बलात्कार की कोशिश की श्रेणी में नहीं आता, जब तक कि इसके लिए आगे का कोई प्रत्यक्ष कृत्य न हुआ हो।
हाई कोर्ट ने आरोपी को बलात्कार के प्रयास के आरोप से बरी करते हुए उसकी सजा को पुनर्गठित किया। अदालत ने माना कि आरोपी पहले ही लगभग 8 महीने की जेल काट चुका है, जो कि महिला की लज्जा भंग करने के अपराध के लिए पर्याप्त है। इस प्रकार, अदालत ने उसकी हिरासत अवधि को ही अंतिम सजा मानते हुए राहत प्रदान की। यह फैसला आपराधिक मामलों में अपराध की मंशा और प्रत्यक्ष कृत्य के अंतर को स्पष्ट करने के लिहाज से एक महत्वपूर्ण नज़ीर बन गया है।





