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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · सुबह 8:42 · नई दिल्ली संस्करण

शब्दोत्सव 2026: 'इतिहास' शब्द भारत की देन, वेद जितना प्राचीन है हमारा इतिहास- आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण

राष्ट्रीय सागर डेस्क2 मिनट का पठन
शब्दोत्सव 2026: 'इतिहास' शब्द भारत की देन, वेद जितना प्राचीन है हमारा इतिहास- आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण

नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में आयोजित 'शब्दोत्सव 2026' के दूसरे दिन भारत के इतिहास को लेकर एक अहम और विचारोत्तेजक चर्चा देखने को मिली। 'क्या भारत का इतिहास कभी लिखा ही नहीं गया?' जैसे सवाल पर जवाब देते हुए अयोध्या धाम के हनुमन्निवास पीठाधीश्वर आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण ने इसे पूरी तरह से झूठ और दुष्प्रचार करार दिया।

उन्होंने कहा कि यह एक ऐसा झूठ है जिसे बार-बार दोहराकर सच साबित करने की कोशिश की गई है। आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि "इतिहास" शब्द स्वयं भारत ने दुनिया को दिया है और यह हमारी प्राचीन सभ्यता की देन है। उन्होंने कहा कि भारत में इतिहास उतना ही पुराना है जितने पुराने हमारे वेद हैं।

अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा कि वेद विश्व का सबसे प्राचीन वांग्मय है और पूरी दुनिया ने, चाहे अनिच्छा से ही सही, ऋग्वेद की प्राचीनता को स्वीकार किया है। भारत में उपनिषद काल से ही इतिहास शब्द का प्रयोग मिलता है, जो यह साबित करता है कि इतिहास लेखन की परंपरा बहुत प्राचीन है।

आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण ने कहा कि प्राचीनता को समझने और स्वीकार करने के लिए आधुनिक सोच को भी बौद्धिक रूप से परिपक्व होना होगा।

भारत में वेद पढ़ने की परंपरा ही इतिहास से शुरू होती है। भारतीय इतिहास का केंद्रीय तत्व 'शांत रस' है।

उन्होंने रामायण और श्रीमद्भगवद्गीता का उदाहरण देते हुए कहा कि इन ग्रंथों का मूल भाव भी शांत रस ही है। इससे यह प्रमाणित होता है कि इतिहास के अध्ययन में पुरातात्विक साक्ष्य का महत्व है।

उन्होंने भारतीय समाज की परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत में इतिहास बताए बिना तो बेटे का विवाह तक दुर्लभ माना जाता है।

इसका अर्थ है कि इतिहास केवल किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक जीवन का हिस्सा है।

वेदों को काल्पनिक बताए जाने पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने इसे एक तरह का मनोरोग बताया। उन्होंने कहा कि पहले यह समझना जरूरी है कि कल्पना क्या होती है। दुनिया की हर रचना पहले कल्पना के रूप में जन्म लेती है और बाद में वास्तविकता बनती है।

उन्होंने बताया कि वेदों को काल्पनिक कहने वाले यह भी नहीं जानते कि 'कल्प' स्वयं एक विद्या है और यह वेद के छह अंगों में से एक है।

कल्प की पद्धति से जो अस्तित्व में आया, वह यह साबित करता है कि महर्षियों द्वारा की गई कल्पना भी वैज्ञानिक और व्यवस्थित थी।

आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण ने कहा कि आज तक कोई भी वैज्ञानिक वेदों में स्थापित सिद्धांतों को झूठा साबित नहीं कर पाया है। जब विज्ञान किसी बात को असत्य सिद्ध नहीं कर सका, तो उसे केवल कल्पना या मिथक कहना अनुचित है और ये केवल एक दुष्प्रचार है।

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