संभल जामा मस्जिद हिंसा मामला - सुप्रीम कोर्ट ने पलटा हाईकोर्ट का फैसला, यूपी सरकार को 10 लाख का झटका, NSA रद्द

संभल हिंसा मामले में उत्तर प्रदेश सरकार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने संभल हिंसा के आरोपी मुल्ला अफरोज की NSA के तहत हिरासत को रद्द कर दिया है और यूपी सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। कोर्ट ने इसे गैर-कानूनी प्रिवेंटिव डिटेंशन बताया। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने मंगलवार 29 सितंबर 2026 को ये फैसला सुनाया। बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को भी पलट दिया जिसमें हाईकोर्ट ने डिटेंशन ऑर्डर को सही ठहराया था। कोर्ट ने कहा कि ये 10 लाख की राशि मुल्ला अफरोज को मुआवजे के तौर पर दी जाए।
ये मामला 24 नवंबर 2024 को संभल की शाही जामा मस्जिद के कोर्ट द्वारा आदेशित सर्वे के दौरान हुई हिंसा से जुड़ा है। सर्वे के दौरान भीड़ और पुलिस के बीच हिंसक झड़प हुई थी जिसमें 4 लोगों की मौत हो गई थी। पुलिस ने मुल्ला अफरोज को इस हिंसा का मास्टरमाइंड और मुख्य साजिशकर्ता बताया था। पुलिस ने अफरोज को घटना के करीब 54 दिन बाद गिरफ्तार किया था। ये गिरफ्तारी पुलिस कस्टडी में मौजूद अन्य आरोपियों के कबूलनामे के आधार पर की गई थी। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उसे जमानत दे दी थी। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
जमानत के बाद 13 अक्टूबर 2025 को संभल के जिलाधिकारी ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, 1980 यानी NSA की धारा 3 के तहत उसके खिलाफ प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश जारी कर दिया। अफरोज ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन हाईकोर्ट ने NSA कार्रवाई को बरकरार रखा। इसके बाद अफरोज ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट में अफरोज की तरफ से दलील दी गई कि उसकी गिरफ्तारी का आधार सिर्फ पुलिस हिरासत में दिया गया कबूलनामा है, जो कानूनन मान्य नहीं है। साथ ही कहा गया कि किसी व्यक्ति के नाम पर कई आपराधिक मामले होना ही उसे NSA में बंद करने का आधार नहीं हो सकता। इसके लिए ठोस सबूत जरूरी हैं।
याचिकाकर्ता ने ‘रेखा बनाम तमिलनाडु राज्य’ और ‘अमीना बेगम बनाम तेलंगाना राज्य’ जैसे फैसलों का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि सिर्फ इस आशंका पर कि व्यक्ति दोबारा अपराध कर सकता है, प्रिवेंटिव डिटेंशन नहीं लगाई जा सकती। वहीं यूपी सरकार ने अपने आदेश का बचाव करते हुए कहा कि अफरोज के बाहर रहने से दोबारा हिंसा भड़कने और पब्लिक ऑर्डर बिगड़ने का खतरा है, इसलिए NSA जरूरी था। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की दलील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि ‘एक्स्ट्रा-जुडिशियल कन्फेशन’ यानी पुलिस हिरासत में किया गया कबूलनामा, जो कोर्ट में स्वीकार्य भी नहीं है, उसे अकेले प्रिवेंटिव डिटेंशन का आधार नहीं बनाया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि हिरासत का आदेश देने वाले अधिकारी को ‘सब्जेक्टिव सैटिस्फैक्शन’ के लिए सभी परिस्थितियों को देखना चाहिए था। अफरोज के मामले में अधिकारियों ने ऐसा नहीं किया और अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल किया। कोर्ट ने 8 सितंबर को सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया था और अब ये अहम फैसला सुनाते हुए यूपी सरकार की कार्रवाई को अवैध करार दिया है।
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