ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वैश्विक शासन पर तीखा प्रहार: बोले – "20वीं सदी के टाइपराइटर से 21वीं सदी के सॉफ्टवेयर नहीं चल सकते"
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वैश्विक शासन पर तीखा प्रहार: बोले – "20वीं सदी के टाइपराइटर से 21वीं सदी के सॉफ्टवेयर नहीं चल सकते"
ब्रासीलिया/नई दिल्ली, 6 जुलाई 2025।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 17वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान वैश्विक शासन संरचनाओं पर एक स्पष्ट और प्रभावशाली बयान देते हुए कहा कि 20वीं सदी में बनी वैश्विक संस्थाएं आज की जटिल वैश्विक चुनौतियों से निपटने में पूरी तरह अक्षम हैं। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि "बिना ग्लोबल साउथ के ये संस्थाएं वैसी ही हैं जैसे मोबाइल में सिम हो लेकिन नेटवर्क नहीं।" उनका यह बयान न केवल वैश्विक शक्ति संतुलन में भारत के दृष्टिकोण को रेखांकित करता है, बल्कि ब्रिक्स के मंच पर भारत की बढ़ती नेतृत्व भूमिका का भी प्रतीक है।
प्रधानमंत्री मोदी ने ब्रिक्स अध्यक्ष ब्राजील के राष्ट्रपति लूला द सिल्वा को उत्कृष्ट नेतृत्व के लिए धन्यवाद देते हुए उनके कार्यकाल को "डबल एस्प्रेसो शॉट" जैसा ऊर्जावान बताया। उन्होंने कहा कि ब्रिक्स सहयोग को नई ऊर्जा मिली है, जो ब्राजील की दूरदर्शिता और प्रतिबद्धता का प्रमाण है। साथ ही, उन्होंने इंडोनेशिया के ब्रिक्स में शामिल होने पर राष्ट्रपति प्रबोवो को बधाई दी और उन्हें भारत की शुभकामनाएं प्रेषित कीं।
अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि ग्लोबल साउथ दशकों से दोहरे मानकों का शिकार रहा है, चाहे वह जलवायु वित्त की बात हो, टिकाऊ विकास हो या प्रौद्योगिकी तक पहुंच का मुद्दा। उन्होंने आलोचना की कि ग्लोबल साउथ को अब तक सिर्फ औपचारिक इशारे (token gestures) ही मिलते आए हैं, ठोस सहयोग नहीं।
उन्होंने कहा कि दुनिया के वे देश, जो आज वैश्विक अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभा रहे हैं, उन्हें निर्णय प्रक्रिया की टेबल पर उचित स्थान नहीं दिया गया है। यह केवल प्रतिनिधित्व का प्रश्न नहीं है, बल्कि वैश्विक संस्थानों की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता से भी जुड़ा मसला है।
प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आज के समय में एक समावेशी और बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था (Multipolar and Inclusive World Order) की आवश्यकता है और इसकी शुरुआत वैश्विक संस्थानों में वास्तविक और सार्थक सुधारों से होनी चाहिए। उन्होंने ज़ोर देते हुए कहा कि “गवर्नेंस स्ट्रक्चर, वोटिंग राइट्स और नेतृत्व पदों में बदलाव जरूरी है। ग्लोबल साउथ की चुनौतियों को नीति निर्माण में प्राथमिकता मिलनी चाहिए।”
प्रधानमंत्री ने एक बेहद सटीक उपमा के माध्यम से कहा कि “AI के युग में, जहां हर हफ्ते टेक्नोलॉजी अपडेट होती है, वहां वैश्विक संस्थानों का 80 वर्षों में एक बार भी अपडेट न होना स्वीकार्य नहीं है। 21वीं सदी के सॉफ्टवेयर को 20वीं सदी के टाइपराइटर से नहीं चलाया जा सकता।”
अपने समापन वक्तव्य में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत ने हमेशा अपने राष्ट्रीय हितों से ऊपर उठकर मानवता के व्यापक हितों के लिए कार्य किया है। उन्होंने ब्रिक्स देशों के साथ मिलकर रचनात्मक सहयोग की प्रतिबद्धता जताते हुए वैश्विक संस्थाओं में आवश्यक सुधारों को मजबूती से आगे बढ़ाने का संकल्प दोहराया।
PM MODI का भाषण न केवल भारत की विदेश नीति के बदलते आत्मविश्वास का प्रतीक है, बल्कि वैश्विक दक्षिण की आवाज़ को वैश्विक मंचों पर मजबूती से रखने की एक ऐतिहासिक पहल भी है। प्रधानमंत्री मोदी का यह दृष्टिकोण बताता है कि भारत अब केवल एक भागीदार नहीं, बल्कि वैश्विक शासन में एक निर्णायक शक्ति बनने की ओर अग्रसर है।





