मुख्य सामग्री पर जाएँ
ब्रेकिंग
Rajasthan Panchayat Election 2026: पंचायत चुनाव का ऐलान, 4 चरणों में होगी वोटिंग, जानिए पूरा शेड्यूलमुंबई में CJP का प्रदर्शन पड़ा भारी! जेल भरो आंदोलन पर FIR, आयोजकों में हड़कंपज्ञानेश कुमार पर चले लोकतंत्र की हत्या का मुकदमा! प्रमोद तिवारी का बड़ा हमलाBJP का झंडा उतारने वाले संजयन त्रिपाठी अब साइकिल पर सवार, समाजवादी पार्टी में हुए शामिलCM Yogi का बड़ा तोहफा: 4.60 लाख छात्रों के खाते में आई छात्रवृत्ति, आपके खाते में आई क्या? चेक करेंNoida: सुपरनोवा की 43वीं मंजिल से युवक ने लगाई छलांग, मौके पर दर्दनाक मौत, सोसाइटी में हड़कंपमुंबई प्रदर्शन के बाद CJP का दिल्ली कूच का ऐलान, अभिजीत दिपके ने कही ये बड़ी बातगठबंधन में फूट! रायबरेली से डरते थे राहुल गांधी! सपा नेता का बड़ा खुलासा, अखिलेश ने दी थी धमकी

सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 · सुबह 7:36 · नई दिल्ली संस्करण

चैतन्य महाप्रभु ने अध्यात्मवाद और ध्यान को जनता के लिए सुलभ बनाया : प्रधानमंत्री

राष्ट्रीय सागर डेस्क4 मिनट का पठन
चैतन्य महाप्रभु ने अध्यात्मवाद और ध्यान को जनता के लिए सुलभ बनाया : प्रधानमंत्री

नई

दिल्ली, 08 फरवरी । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुरुवार को कहा

कि चैतन्य महाप्रभु कृष्ण प्रेम के प्रतिमान थे। उन्होंने आध्यात्म और

साधना को जन साधारण के लिए सुलभ बनाया। उन्होंने हमें बताया कि ईश्वर की

प्राप्ति केवल संन्यास से ही नहीं, उल्लास से भी की जा सकती है।

प्रधानमंत्री

प्रगति मैदान के भारत मंडपम में श्रील प्रभुपाद की 150वीं जयंती पर आयोजित

कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। प्रधानमंत्री ने आचार्य श्रील प्रभुपाद

की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की और उनके सम्मान में एक स्मारक टिकट और

एक सिक्का जारी किया। गौड़ीय मिशन के संस्थापक आचार्य श्रील प्रभुपाद ने

वैष्णव आस्था के मूलभूत सिद्धांतों के संरक्षण और प्रसार में महत्वपूर्ण

भूमिका निभाई।

प्रधानमंत्री ने कहा कि चैतन्य महाप्रभु जैसी

शख्सियतें समय के साथ किसी न किसी तरह से अपने काम का प्रचार करती हैं,

श्रील प्रभुपाद इस विश्वास के प्रतीक थे। उन्होंने कहा कि श्रील प्रभुपाद

के जीवन ने हमें सिखाया कि ध्यान के साथ कुछ भी कैसे हासिल किया जाए और

अर्थ से लेकर सभी के कल्याण तक का मार्ग रोशन किया।

प्रधानमंत्री

ने वैष्णव भाव से गुजरात के संबंध को रेखांकित किया। उन्होंने गुजरात में

भगवान कृष्ण की लीलाओं और गुजरात में मीरा बाई के ईश्वर में लीन होने का

उल्लेख किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि इसने कृष्ण और चैतन्य महाप्रभु की

परंपरा को मेरे जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बना दिया है।

प्रधानमंत्री

ने भारत की आध्यात्मिक चेतना पर अपने विचारों को याद किया, जो उन्होंने

2016 में गौड़ीय मिशन के शताब्दी वर्ष में दिए थे। उन्होंने जड़ों के महत्व

को रेखांकित किया और कहा कि किसी की जड़ों से दूरी की सबसे बड़ी

अभिव्यक्ति उसकी क्षमताओं और शक्तियों को भूलना है। उन्होंने कहा कि भक्ति

की गौरवशाली परंपरा के साथ भी ऐसा हुआ है। उन्होंने कहा कि कई लोग भक्ति,

तार्किकता और आधुनिकता को विरोधाभासी मानते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि

भक्ति हमारे ऋषियों द्वारा दिया गया एक भव्य दर्शन है। उन्होंने कहा, “जब

भक्ति की बात आती है, तो कुछ लोग सोचते हैं कि भक्ति, तर्क और आधुनिकता ये

विरोधाभासी बातें हैं लेकिन असल में ईश्वर की भक्ति हमारे ऋषियों का दिया

हुआ महान दर्शन है। भक्ति हताशा नहीं, आशा और आत्मविश्वास है। भक्ति भय

नहीं, उत्साह है।” उन्होंने कहा कि भक्ति हार नहीं बल्कि प्रभाव का संकल्प

है। उन्होंने कहा कि भक्ति में स्वयं पर विजय पाना और मानवता के लिए काम

करना शामिल है। उन्होंने कहा कि इसी भावना के कारण भारत ने अपनी सीमा के

विस्तार के लिए कभी दूसरों पर आक्रमण नहीं किया। उन्होंने लोगों को भक्ति

की महिमा से पुनः परिचित कराने के लिए संतों को श्रद्धांजलि अर्पित की।

प्रधानमंत्री ने कहा, “आज आजादी के अमृत काल में देश 'गुलामी की मानसिकता

से मुक्ति' का संकल्प लेकर संतों के संकल्प को आगे बढ़ा रहा है।”

प्रधानमंत्री

मोदी ने भारत के सांस्कृतिक और सामाजिक ताने-बाने में आध्यात्मिक नेताओं

के महत्वपूर्ण योगदान की सराहना की। उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम

और इसके राष्ट्रीय लोकाचार को आकार देने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर

दिया। मोदी ने कहा कि हमारे भक्ति मार्गी संतों ने न केवल स्वतंत्रता

आंदोलन में बल्कि हर चुनौतीपूर्ण चरण में राष्ट्र का मार्गदर्शन करने में

भी अमूल्य भूमिका निभाई है।

मोदी ने याद किया कि आजादी के

संघर्ष के दौरान स्वामी विवेकानन्द और श्रील प्रभुपाद जैसे आध्यात्मिक

विभूतियों ने जनता में असीम ऊर्जा का संचार किया और उन्हें धार्मिकता के

मार्ग पर अग्रसर किया। उन्होंने कहा कि नेताजी सुभाष और महामना मालवीय जैसी

हस्तियों ने श्रील प्रभुपाद से मार्गदर्शन मांगा।

प्रधानमंत्री

ने कहा, “बलिदान के माध्यम से सहन करने और अमर रहने का आत्मविश्वास भक्ति

योग के अभ्यास से प्राप्त होता है।” प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा, “आज,

इसी आत्मविश्वास और भक्ति के साथ, लाखों भारतीय आध्यात्मिक यात्रा पर निकल

पड़े हैं, जिससे हमारे देश में समृद्धि के युग की शुरुआत हुई है। हम

राष्ट्र को 'देव' मानते हैं और 'देव से देश' की दृष्टि से आगे बढ़ते हैं।”

प्रधानमंत्री

ने कहा कि दुनिया के लिए एक राष्ट्र एक राजनीतिक विचारधारा का

प्रतिनिधित्व कर सकता है लेकिन भारत के लिए 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' एक

आध्यात्मिक विश्वास है।

श्रील प्रभुपाद के जीवन को 'एक

भारत, श्रेष्ठ भारत' का उदाहरण बताते हुए प्रधानमंत्री ने बताया कि उनका

जन्म पुरी में हुआ था। उन्होंने दक्षिण के रामानुजाचार्य जी की परंपरा में

दीक्षा ली और चैतन्य महाप्रभु की परंपरा को आगे बढ़ाया। उनकी आध्यात्मिक

यात्रा का केंद्र बंगाल में उनका मठ रहा। मोदी ने कहा, "बंगाल आध्यात्मिकता

और बौद्धिकता से निरंतर ऊर्जा का स्रोत है।” उन्होंने कहा कि बंगाल की

भूमि ने देश को रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, श्री अरबिंदो, गुरु

रवींद्रनाथ टैगोर और राजा राममोहन राय जैसे संत दिए।

यह ख़बर दूसरों तक पहुँचाएँ

WhatsAppFacebookX

संबंधित ख़बरें