पवन कल्याण का भाषाई बयान बना चर्चा का विषय: "तेलुगु हमारी मां है, लेकिन हिंदी हमारी बड़ी मां है"

पवन कल्याण का भाषाई बयान बना चर्चा का विषय: "तेलुगु हमारी मां है, लेकिन हिंदी हमारी बड़ी मां है"
हैदराबाद, 12 जुलाई 2025 — आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और जनसेना पार्टी के प्रमुख पवन कल्याण एक बार फिर अपने बयान को लेकर सुर्खियों में हैं। एक कार्यक्रम के दौरान भाषाई एकता और राष्ट्रीय संवाद पर बात करते हुए उन्होंने कहा, “तेलुगु हमारी मां है, लेकिन हिंदी हमारी बड़ी मां है।” उनके इस कथन के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं। कुछ लोगों ने इसे राष्ट्रीय एकता के समर्थन में कहा गया सकारात्मक वक्तव्य माना, वहीं कई दक्षिण भारतीय नेताओं और कलाकारों ने इसे "हिंदी थोपने" की मानसिकता करार दिया।
पवन कल्याण ने यह बयान हैदराबाद में आयोजित "राज्य भाषा स्वर्ण जयंती समारोह" के दौरान दिया। उन्होंने हिंदी को भारत की प्रमुख संपर्क भाषा बताते हुए कहा कि यह भाषा देश को जोड़ती है और दक्षिण भारतीयों को हिंदी सीखने में कोई हानि नहीं, बल्कि लाभ ही है। उन्होंने दक्षिण भारत की फिल्म इंडस्ट्री का उदाहरण देते हुए कहा कि हिंदी में डब की गई तेलुगु और तमिल फिल्में पूरे भारत में सफल हो रही हैं, जिससे न केवल क्षेत्रीय सिनेमा को पहचान मिल रही है, बल्कि आर्थिक लाभ भी हो रहा है।
हालांकि, उनके इस बयान का विरोध करते हुए जाने-माने अभिनेता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रकाश राज ने ट्वीट कर कहा, “तेलुगु तुम्हारी मां है, हिंदी हमारी नहीं। किसी की मातृभाषा पर अपनी भाषा को थोपने की कोशिश मत करो।” इसी के साथ DMK और कुछ तमिल संगठनों ने भी इस बयान पर नाराज़गी जताई और कहा कि यह दक्षिण भारतीय भाषाओं की गरिमा को कमतर आंकने की कोशिश है।
बाद में पवन कल्याण ने अपने बयान पर सफाई देते हुए कहा कि उनकी मंशा हिंदी थोपने की नहीं थी, बल्कि वह हिंदी को एक सेतु भाषा के रूप में देख रहे हैं जो पूरे भारत को जोड़ने में मदद कर सकती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह मातृभाषा के महत्व को सर्वोपरि मानते हैं और क्षेत्रीय भाषाओं की रक्षा के पक्षधर हैं।
यह घटना भारत में चल रहे भाषा विमर्श को फिर से केंद्र में ले आई है, जहां एक ओर केंद्र सरकार तीन-भाषा फॉर्मूले के तहत हिंदी, अंग्रेज़ी और एक क्षेत्रीय भाषा को बढ़ावा देने की नीति पर चल रही है, वहीं दूसरी ओर दक्षिण भारत में हिंदी को लेकर संवेदनशीलता बनी हुई है। पवन कल्याण के इस बयान ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत जैसे बहुभाषी देश में किसी एक भाषा को "बड़ी मां" कहकर बाकी भाषाओं के प्रति संवेदनशीलता बरती जा सकती है?
फिलहाल, राजनीतिक गलियारों में यह बहस थमती नहीं दिख रही है, लेकिन यह ज़रूर स्पष्ट हो गया है कि भारत में भाषा सिर्फ संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि पहचान, संस्कृति और सम्मान का प्रतीक भी है।





